मनुष्य और अन्य सभी जीव उनकी आंतरिक ऊर्जाओं से निर्मित हैं। इस प्रकार जीव भी भगवान के ही समान होता है। परंतु वह कभी भी भगवान के समकक्ष या उनसे श्रेष्ठ नहीं हो सकता। भगवान और जीव सभी अलग-अलग व्यक्ति हैं। जीव भी भौतिक ऊर्जाओं की मदद से कुछ चीजों का निर्माण कर रहे हैं, लेकिन उनके बनाई हुई कोई भी चीज भगवान की रचनाओं के बराबर या श्रेष्ठ नहीं है। मनुष्य कोई छोटा सा खिलौना स्पुतनिक बना सकता है और उसे अंतरिक्ष में फेंक सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह पृथ्वी या चंद्रमा जैसे ग्रह बना सकता है और उसे हवा में तैरा सकता है जैसे भगवान करते हैं। सीमित ज्ञान वाले लोग भगवान के बराबर होने का दावा करते हैं। वे कभी भी भगवान के बराबर नहीं हो सकते। यह कभी नहीं हो सकता। मनुष्य पूर्ण रूप से सिद्धि प्राप्त करने के बाद, भगवान के गुणों का एक बड़ा हिस्सा (लगभग अड़हत्तर प्रतिशत) प्राप्त कर सकता है, लेकिन भगवान को पार करना या उनके बराबर होना कभी संभव नहीं है। केवल एक बीमार अवस्था में, मूर्ख व्यक्ति भगवान के साथ एक होने का दावा करता है और इस प्रकार वह मायावी ऊर्जा द्वारा गुमराह हो जाता है। इसलिए, गुमराह जीवों को भगवान की सर्वोच्चता को स्वीकार करना चाहिए और उनकी प्रेमपूर्ण सेवा करना चाहिए। इसके लिए ही उनकी रचना की गई है। इसके बिना, दुनिया में कोई शांति या सुकून नहीं हो सकता। श्रील नारद ने श्रील व्यासदेव को भागवतम में इस विचार को विस्तृत करने की सलाह दी है। भगवद-गीता में भी उसी विचार की व्याख्या की गई है: भगवान के चरण कमलों में समर्पण करो। वही एक सिद्ध मनुष्य का कार्य है।
