श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.5.19 
न वै जनो जातु कथञ्चनाव्रजे-
न्मुकुन्दसेव्यन्यवदङ्ग संसृतिम् ।
स्मरन्मुकुन्दाङ्‌घ्र्युरपगूहनं पुन-
र्विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो जन: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
ओह प्रिय व्यास, यद्यपि भगवान कृष्ण का भक्त भी कभी-कभी किसी न किसी कारणवश नीचे गिर जाता है, परंतु उसे दूसरों (सकाम कर्मियों आदि) की तरह भव-चक्र में भटकना नहीं पड़ता, क्योंकि जिस व्यक्ति ने भगवान के चरण-कमलों का आस्वादन एक बार किया है, वह उस आनंद को बार-बार स्मरण करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता।
 
O dear Vyasa, although a devotee of Lord Krishna also falls down at times due to one reason or another, he does not have to come through the cycle of existence like others (seekers of desire, etc.), because a person who has tasted the lotus feet of the Lord once can do nothing except remembering that bliss again and again.
तात्पर्य
प्रभु का भक्त स्वतः ही भौतिक अस्तित्व के आकर्षण से उदासीन हो जाता है क्योंकि वह रस-ग्रह होता है, अथवा प्रभु कृष्ण के चरण कमलों की मधुरता का आस्वादन करने वाला होता है। निश्चित रूप से कई घटनाएँ मिलती हैं जहाँ प्रभु के भक्त अनुचित संगति के कारण पतन को प्राप्त हो गए, उन फलवादी कर्मियों के समान, जो हमेशा पतन के शिकार होते हैं। किंतु यद्यपि वह पतन को प्राप्त हो जाता है, एक भक्त को कभी भी पतित कर्मी के समान नहीं माना जाना चाहिए। एक कर्मी अपनी फलदायक प्रतिक्रियाओं के परिणामों को भोगता है, जबकि एक भक्त स्वयं प्रभु द्वारा निर्देशित दंड से सुधारा जाता है। एक अनाथ के कष्ट और एक राजा के प्रिय पुत्र के कष्ट कभी एक नहीं हो सकते हैं। एक अनाथ वास्तव में दरिद्र है क्योंकि उसके पास उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं, किंतु एक अमीर आदमी का लाडला बेटा, यद्यपि वह अनाथ के समान ही स्तर पर दिखाई पड़ता है, वह हमेशा अपने सक्षम पिता की निगरानी में होता है। प्रभु का भक्त, गलत संगति के कारण, कभी-कभार फलवादी कर्मियों की नक़ल करता है। फलवादी कर्मी भौतिक जगत पर हुकूमत चाहते हैं। ठीक इसी प्रकार, एक नौसिखिया भक्त मूर्खतावश अपनी भक्तियोग सेवा के बदले में कुछ भौतिक शक्ति संचित करने के बारे में सोचता है। ऐसे मूर्ख भक्त कभी-कभार स्वयं प्रभु द्वारा कठिनाई में डाल दिए जाते हैं। एक विशेष कृपा के रूप में, वह सभी भौतिक साधनों को हटा सकते हैं। इस तरह की कार्रवाई से, घबराया हुआ भक्त सभी दोस्तों और रिश्तेदारों द्वारा त्याग दिया जाता है, और इसलिए वह प्रभु की कृपा से फिर से होश में आता है और अपनी भक्तियोग सेवा को करने के लिए सीधा मार्ग प्राप्त करता है।

भगवद्गीता में भी यह कहा गया है कि ऐसे पतित भक्तों को अत्यधिक योग्य ब्राह्मणों या एक अमीर व्यापारिक परिवार में जन्म लेने का अवसर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में एक भक्त उतना भाग्यशाली नहीं होता जितना कि वह जो प्रभु द्वारा दंडित किया जाता है और असहायतापूर्ण स्थिति में डाल दिया जाता है। वह भक्त जो प्रभु की इच्छा से असहाय हो जाता है, उनसे कहीं अधिक भाग्यशाली होता है जो अच्छे परिवार में पैदा होते हैं। एक अच्छे परिवार में पैदा हुए पतित भक्त प्रभु के चरण कमलों को भूल सकते हैं क्योंकि वे कम भाग्यशाली होते हैं, किंतु वह भक्त जो एक निराशाजनक स्थिति में डाल दिया जाता है अधिक भाग्यशाली होता है क्योंकि वह खुद को चारों ओर असहाय मानते हुए शीघ्र प्रभु के चरण कमलों की ओर लौटता है।

पवित्र भक्तियोग सेवा इतनी आध्यात्मिक रूप से रूचिकर होती है कि एक भक्त स्वतः ही भौतिक भोग से उदासीन हो जाता है। यह प्रगतिशील भक्तियोग सेवा में पूर्णता का प्रमाण है। एक पवित्र भक्त सतत प्रभु श्री कृष्ण के चरण कमलों को स्मरण करता है और उन्हें एक पल के लिए भी नहीं भूलता, यहाँ तक कि तीनों लोकों की सभी संपन्नता के बदले में भी नहीं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)