भगवद्गीता में भी यह कहा गया है कि ऐसे पतित भक्तों को अत्यधिक योग्य ब्राह्मणों या एक अमीर व्यापारिक परिवार में जन्म लेने का अवसर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में एक भक्त उतना भाग्यशाली नहीं होता जितना कि वह जो प्रभु द्वारा दंडित किया जाता है और असहायतापूर्ण स्थिति में डाल दिया जाता है। वह भक्त जो प्रभु की इच्छा से असहाय हो जाता है, उनसे कहीं अधिक भाग्यशाली होता है जो अच्छे परिवार में पैदा होते हैं। एक अच्छे परिवार में पैदा हुए पतित भक्त प्रभु के चरण कमलों को भूल सकते हैं क्योंकि वे कम भाग्यशाली होते हैं, किंतु वह भक्त जो एक निराशाजनक स्थिति में डाल दिया जाता है अधिक भाग्यशाली होता है क्योंकि वह खुद को चारों ओर असहाय मानते हुए शीघ्र प्रभु के चरण कमलों की ओर लौटता है।
पवित्र भक्तियोग सेवा इतनी आध्यात्मिक रूप से रूचिकर होती है कि एक भक्त स्वतः ही भौतिक भोग से उदासीन हो जाता है। यह प्रगतिशील भक्तियोग सेवा में पूर्णता का प्रमाण है। एक पवित्र भक्त सतत प्रभु श्री कृष्ण के चरण कमलों को स्मरण करता है और उन्हें एक पल के लिए भी नहीं भूलता, यहाँ तक कि तीनों लोकों की सभी संपन्नता के बदले में भी नहीं।
