श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.5.18 
तस्यैव हेतो: प्रयतेत कोविदो
न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यध: ।
तल्लभ्यते दु:खवदन्यत: सुखं
कालेन सर्वत्र गभीररंहसा ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
वास्तव में जो लोग बुद्धिमान और तत्त्वज्ञान में रूचि रखते हैं, उन्हें केवल उस सार्थक उद्देश्य के लिए प्रयास करना चाहिए जो सबसे ऊँचे लोक (ब्रह्मलोक) से लेकर सबसे निचले लोक (पाताल) तक भटकने से भी प्राप्त नहीं हो सकता है। जहाँ तक इंद्रिय-सुख से मिलने वाले सुख की बात है, वह तो समय के साथ अपने आप प्राप्त हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे समय के साथ दुख भी मिलते रहते हैं, भले ही हम उन्हें न चाहें।
 
Those who are really intelligent and interested in philosophy should strive for that meaningful end which cannot be attained even by roaming from the highest world (Brahmaloka) to the lowest world (Paataal). As far as the happiness derived from sense-enjoyment is concerned, it is automatically attained with time, just as we keep getting sorrows even when we do not want it.
तात्पर्य
हर आदमी हर जगह कई प्रयासों से अधिक से अधिक इंद्रिय-सुख प्राप्त करने का प्रयास करता है। कुछ लोग व्यापार, उद्योग, आर्थिक विकास, राजनीतिक वर्चस्व आदि में व्यस्त रहते हैं, और उनमें से कुछ अगले जीवन में उच्च ग्रहों को प्राप्त करके खुश होने के लिए लाभकारी काम में लगे होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि चंद्रमा पर रहने वाले सोम-रस पीने से अधिक इंद्रिय-सुख के लिए उपयुक्त हैं, और पितृलोक अच्छे धर्मार्थ कार्य से प्राप्त होता है। इसलिए इंद्रिय-सुख के लिए विभिन्न कार्यक्रम हैं, या तो इस जीवन के दौरान या मृत्यु के बाद के जीवन में। कुछ लोग किसी यांत्रिक व्यवस्था द्वारा चंद्रमा या अन्य ग्रहों तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि वे अच्छे काम किए बिना ही ऐसे ग्रहों में प्रवेश करने के लिए बहुत उत्सुक हैं। लेकिन ऐसा नहीं होगा। सर्वोच्च के नियम से, उन्होंने जो काम किया है उसके अनुसार रहने वाले प्राणियों के विभिन्न वर्गों के लिए अलग-अलग स्थान हैं। केवल अच्छे काम से, जैसा कि शास्त्रों में निर्धारित किया गया है, कोई अच्छे परिवार, संपन्नता, अच्छी शिक्षा और अच्छे शारीरिक गुणों का जन्म प्राप्त कर सकता है। हम यह भी देखते हैं कि इस जीवन में भी कोई व्यक्ति अच्छे काम से अच्छी शिक्षा या धन प्राप्त करता है। इसी तरह, हमारे अगले जन्म में हमें केवल अच्छे काम से ही ऐसी वांछनीय स्थिति मिलती है। अन्यथा, ऐसा नहीं होता कि एक ही समय पर एक ही स्थान पर जन्मे दो व्यक्तियों को पिछले काम के अनुसार अलग-अलग जगह रखा गया हो। लेकिन ऐसी सभी भौतिक स्थितियाँ अस्थायी हैं। ब्रह्मलोक में और सबसे निचले पाताल में भी स्थितियाँ हमारे अपने काम के अनुसार बदल जाती हैं। दार्शनिक रूप से प्रेरित व्यक्ति को ऐसी परिवर्तनशील स्थितियों से प्रलोभित नहीं होना चाहिए। उसे आनंद और ज्ञान के स्थायी जीवन में जाने की कोशिश करनी चाहिए जहाँ उसे इस या उस ग्रह पर दयनीय भौतिक दुनिया में वापस आने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। दुख और मिश्रित सुख भौतिक जीवन की दो विशेषताएँ हैं, और ये ब्रह्मलोक और अन्य लोकों में भी प्राप्त होते हैं। इन्हें देवताओं के जीवन में और कुत्तों और सूअरों के जीवन में भी प्राप्त किया जाता है। सभी जीवित प्राणियों के दुख और मिश्रित सुख केवल डिग्री और गुणवत्ता में भिन्न होते हैं, लेकिन जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और रोग के दुखों से कोई भी मुक्त नहीं है। इसी तरह, हर किसी का नियत सुख भी है। कोई भी व्यक्ति केवल व्यक्तिगत प्रयासों से इन चीजों को अधिक या कम नहीं प्राप्त कर सकता है। यदि वे प्राप्त भी हो जाते हैं, तो उन्हें फिर से खोया जा सकता है। इसलिए, किसी को भी इन तुच्छ चीजों के साथ समय बर्बाद नहीं करना चाहिए; केवल भगवद भक्ति में लौटने का प्रयास करना चाहिए। यही हर किसी के जीवन का मिशन होना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)