श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 5: नारद द्वारा व्यासदेव को श्रीमद्भागवत के विषय में आदेश  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.5.16 
विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो-
रनन्तपारस्य निवृत्तित: सुखम् ।
प्रवर्तमानस्य गुणैरनात्मन-
स्ततो भवान्दर्शय चेष्टितं विभो: ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
सर्वशक्तिमान परमेश्वर असीमित हैं। केवल वही महान व्यक्ति ही इस आध्यात्मिक ज्ञान को समझने के योग्य है, जो भौतिक सुखों के कार्यों से विरक्त हो गया है। इसलिए जो लोग भौतिक मोह के कारण अच्छी स्थिति में नहीं हैं, उन्हें दिव्य कार्यों के वर्णन के माध्यम से परमेश्वर की दिव्य प्राप्ति का मार्ग दिखाना चाहिए।
 
The Lord is infinite. Only a person who is adept at understanding this spiritual knowledge is capable of detaching himself from the activities of material pleasure. Therefore, to those who are not well established in material attachment, show them the methods of divine realization through the descriptions of the transcendental activities of the Supreme Lord.
तात्पर्य
वैश्विक ज्ञान एक कठिन विषय है, विशेष रूप से जब यह परमात्मा की अलौकिक प्रकृति से संबंधित होता है। यह उन लोगों के समझने लायक विषय नहीं है, जो सांसारिक गतिविधियों में अत्यधिक आसक्त हैं। केवल वे कुशल व्यक्ति ही इस महान ज्ञान के अध्ययन में प्रवेश कर सकते हैं, जो सांसारिक ज्ञान और संस्कृति से लगभग अलग हो चुके हैं। भगवद गीता में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि लाखों-करोड़ों लोगों में से केवल एक व्यक्ति ही आध्यात्मिक साक्षात्कार के लिए पात्र है। और ऐसे लाखों आध्यात्मिक रूप से साक्षात्कारित लोगों में से केवल कुछ ही ऐसे लोग हैं, जो परमात्मा के साथ एक व्यक्ति के रूप में व्यवहार करने वाले धर्मशास्त्रीय ज्ञान को विशिष्ट रूप से समझ सकते हैं। इसलिए नारदजी द्वारा श्री व्यासदेव को सलाह दी जाती है कि वे परमात्मा की अलौकिक गतिविधियों का वर्णन करके परमात्मा के ज्ञान का सीधे वर्णन करें। व्यासदेव स्वयं इस ज्ञान में निपुण व्यक्तित्व हैं, और वे सांसारिक भोगों से अनजान हैं। इसलिए वे इसका वर्णन करने के लिए सही व्यक्ति हैं, और व्यासदेव के पुत्र, श्री शुकादेव गोस्वामी इसे प्राप्त करने के लिए सही व्यक्ति हैं।

श्रीमद्भागवतम सर्वोच्च धार्मिक ज्ञान है, और इसलिए यह आम लोगों पर औषधीय剂 की तरह असर कर सकता है। क्योंकि इसमें परमात्मा की दिव्य लीलाएँ हैं, इसलिए परमात्मा और साहित्य के बीच कोई अंतर नहीं है। साहित्य परमात्मा का वास्तविक साहित्यिक अवतार है। इसलिए आम आदमी परमात्मा के कार्यों का वर्णन सुन सकते हैं। इस तरह से वे परमात्मा के साथ जुड़ने में सक्षम होते हैं और इस प्रकार धीरे-धीरे भौतिक रोगों से मुक्त हो जाते हैं। विशेषज्ञ भक्त भी कुछ समय और परिस्थितियों के हिसाब से, भक्तों को बदलने के लिए उपन्यास तरीके और उपाय खोज सकते हैं। भक्ति सेवा एक गतिशील गतिविधि है, और विशेषज्ञ भक्त भौतिकवादी लोगों के मंद मस्तिष्क में इसे डालने के लिए सक्षम माध्यम ढूंढ सकते हैं। परमात्मा की सेवा के लिए भक्तों की ऐसी आध्यात्मिक गतिविधियाँ भौतिकवादी लोगों के मूर्ख समाज में जीवन की एक नई व्यवस्था ला सकती हैं। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके बाद के अनुयायियों ने इस संबंध में विशेष निपुणता दिखाई है। उसी पद्धति का पालन करके, कोई इस कलह के युग के भौतिकवादी लोगों को शांतिपूर्ण जीवन और दिव्य साक्षात्कार के लिए क्रम में ला सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)