संसार में हज़ारों-हज़ारों साहित्यकार हैं और उन्होंने हज़ारों सालों से लोगों की जानकारी के लिए कई, हज़ारों साहित्यिक रचनाएँ लिखी हैं। पर अफ़सोस की बात है कि इनमें से किसी ने भी दुनिया में शांति और सद्भाव नहीं लाया है। इसका कारण है कि उन साहित्य में आध्यात्मिकता का अभाव है; इसलिए विशेष रूप से भगवद-गीता और श्रीमद-भागवतम जैसे वैदिक साहित्य को दीन-दुखी मानवता के लिए ख़ास तौर पर सिफ़ारिश की जाती है ताकि उसे भौतिक सभ्यता के पंजों से मुक्ति दिलाने वाला वांछित प्रभाव प्राप्त हो सके, जो मानव ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण हिस्से को नष्ट कर रही है। भागवद-गीता स्वयं भगवान का संदेश है जिसे व्यासदेव ने लिखा है और श्रीमद-भागवतम उसी भगवान कृष्ण की गतिविधियों का दिव्य वर्णन है, जो अकेले ही सजीव प्राणी की अनंत शांति और दुखों से मुक्ति की इच्छाओं को संतुष्ट कर सकता है। श्रीमद-भागवतम, इसलिए पूरे विश्व के सभी सजीव प्राणियों के लिए हर तरह की भौतिक बंधनों से मुक्ति के लिए है। भगवान के लीलाओं का ऐसा दिव्य वर्णन निर्वाण प्राप्त आत्माओं जैसे व्यासदेव और उनके यथार्थ प्रतिनिधि ही कर सकते हैं जो भगवान की दिव्य प्रेममयी सेवा में पूरी तरह से लीन हैं। केवल ऐसे भक्तों के लिए भगवान की लीला और उनकी दिव्य प्रकृति भक्ति सेवा के द्वारा खुद-ब-खुद प्रकट हो जाती है। कोई और न तो भगवान के कार्यों को जान सकता है और न ही उनका वर्णन कर सकता है, चाहे वे इस विषय पर कई, कई वर्षों तक विचार क्यों न करें। भागवतम का वर्णन इतना सटीक और सही है कि जो कुछ भी इस महान साहित्य में पाँच हज़ार साल पहले लिखा गया था वह अब बिल्कुल सटीकता से घटित हो रहा है। इसलिए लेखक का दृष्टिकोण अतीत, वर्तमान और भविष्य को समाहित करता है। व्यासदेव जैसे मुक्त व्यक्ति न केवल दृष्टि और ज्ञान की शक्ति से ही सिद्ध होते हैं बल्कि श्रवण में, सोच में, भावना में और अन्य सभी इंद्रिय गतिविधियों में भी सिद्ध होते हैं। एक मुक्त व्यक्ति में सिद्ध इंद्रियाँ होती हैं और केवल सिद्ध इंद्रियों के साथ ही व्यक्ति इंद्रिय स्वामी हृषिकेश, श्री कृष्ण भगवान की सेवा कर सकता है। श्रीमद-भागवतम, इसलिए सर्व-सिद्ध भगवान के सर्व-पूर्ण वर्णन को सर्व-पूर्ण व्यक्तित्व श्रील व्यासदेव द्वारा लिखा गया है जो वेदों के संकलनकर्ता हैं।
