प्रकृति ने अलग-अलग जीवन प्रजातियों को अलग-अलग मानसिकता से प्रभावित किया है, और उन्हें एक ही पद और श्रेणी में लाना संभव नहीं है।
इसी प्रकार, विभिन्न मानसिकता वाले विभिन्न प्रकार के लोगों के लिए साहित्य के भी भिन्न प्रकार हैं। अधिकांशतः बाजार साहित्य, जो कौवे की श्रेणी के लोगों को आकर्षित करता है, वह साहित्य है जिसमें कामुक विषयों के त्याज्य अवशेष होते हैं। उन्हें सामान्यतः स्थूल शरीर और सूक्ष्म मन से संबंधित सांसारिक चर्चाएँ कहा जाता है। वे सांसारिक उपमाओं और रूपक व्यवस्था से भरी सजावटी भाषा में वर्णित विषय-वस्तु से भरे हुए हैं। फिर भी, इसके साथ ही, वे प्रभु का महिमामंडन नहीं करते हैं। किसी भी विषय-वस्तु पर उस प्रकार की कविता और गद्य को मृत शरीर की सजावट माना जाता है। आध्यात्मिक रूप से उन्नत पुरुष जो हंसों की तुलना में हैं, ऐसे मृत साहित्य में आनंद नहीं लेते हैं, जो आध्यात्मिक रूप से मृत लोगों के लिए आनंद का स्रोत हैं। रज और तम गुणों के ये साहित्य विभिन्न लेबल के अंतर्गत वितरित किये जाते हैं, लेकिन वे शायद ही मानव की आध्यात्मिक अभिलाषा की मदद कर सकते हैं, और इसलिए हंस जैसे आध्यात्मिक रूप से उन्नत पुरुषों का उनसे कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे आध्यात्मिक रूप से उन्नत पुरुषों को मानस भी कहा जाता है क्योंकि वे हमेशा आध्यात्मिक तल पर प्रभु की पारलौकिक स्वैच्छिक सेवा के मानक को बनाए रखते हैं। यह स्थूल शारीरिक इंद्रिय संतुष्टि या भौतिक अहंकारी मन के सूक्ष्म अनुमान के लिए फलदायी गतिविधियों को पूरी तरह से मना करता है।
सामाजिक साहित्यकार, वैज्ञानिक, सांसारिक कवि, सैद्धांतिक दार्शनिक और राजनीतिज्ञ जो इंद्रिय सुख की भौतिक उन्नति में पूरी तरह से लीन हैं, वे सभी भौतिक ऊर्जा की कठपुतलियाँ हैं। वे उस स्थान पर प्रसन्न होते हैं जहाँ त्याजे गए विषय-वस्तुओं को फेंका जाता है। स्वामी श्रीधर के अनुसार, यह वेश्या-शिकारी का आनंद है।
लेकिन जो साहित्य प्रभु के गौरव का वर्णन करते हैं, उनका आनंद परमहंसों द्वारा लिया जाता है जिन्होंने मानवीय गतिविधियों के सार को समझ लिया है।
