श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.4.6 
कथमालक्षित: पौरै: सम्प्राप्त: कुरुजाङ्गलान् ।
उन्मत्तमूकजडवद्विचरन् गजसाह्वये ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
कुरु और जांगल प्रदेशों में पागल, गूँगे और मूढ़ की भाँति घूमने के पश्चात, जब वे (व्यासपुत्र श्रील शुकदेव) हस्तिनापुर (अब दिल्ली) नगर में प्रविष्ट हुए, तो वहाँ के नागरिकों ने उन्हें कैसे पहचाना?
 
After wandering in the Kuru and Jhangal regions like a madman, mute and fool, when he (Vyasputra Srila Shukdev) entered the city of Hastinapur (now Delhi), how did the citizens there recognize him?
तात्पर्य
वर्तमान दिल्ली शहर को पहले हस्तिनापुर के नाम से जाना जाता था क्योंकि इसकी स्थापना सबसे पहले राजा हस्ती ने की थी। अपने पैतृक घर को छोड़ने के बाद, गोस्वामी शुकादेव एक पागल की तरह भटक रहे थे, और इसलिए नागरिकों के लिए उन्हें उनके विशिष्ट पद पर पहचानना बहुत कठिन था। इसलिए, एक ऋषि को दृष्टि से नहीं, बल्कि श्रवण से पहचाना जाता है। किसी साधु या महान ऋषि के पास जाना चाहिए उन्हें देखने के लिए नहीं बल्कि उन्हें सुनने के लिए। यदि कोई साधु के शब्दों को सुनने के लिए तैयार नहीं है, तो कोई लाभ नहीं है। शुकादेव गोस्वामी एक साधु थे जो भगवान की पारलौकिक गतिविधियों पर बात कर सकते थे। उन्होंने सामान्य नागरिकों की इच्छाओं को पूरा नहीं किया। उन्हें तब पहचाना गया जब उन्होंने भागवतम् के विषय पर बात की, और उन्होंने कभी भी किसी जादूगर की तरह बाजीगरी करने का प्रयास नहीं किया। बाहरी रूप से वे एक मंदबुद्धि, गूंगे पागल लगते थे, लेकिन वास्तव में वे सबसे ऊंचे पारलौकिक व्यक्ति थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)