दृष्ट्वानुयान्तमृषिमात्मजमप्यनग्नं
देव्यो ह्रिया परिदधुर्न सुतस्य चित्रम् ।
तद्वीक्ष्य पृच्छति मुनौ जगदुस्तवास्ति
स्त्रीपुम्भिदा न तु सुतस्य विविक्तदृष्टे: ॥ ५ ॥
अनुवाद
जब श्री व्यासदेव अपने पुत्र के पीछे-पीछे जा रहे थे, तब नग्न स्नान कर रही सुन्दर युवतियाँ कपड़े से अपने शरीर को ढक लेती थीं, हालांकि श्री व्यासदेव स्वयं नग्न नहीं थे। लेकिन जब उनके पुत्र वहाँ से गुज़रे थे, तब युवतियों ने ऐसा नहीं किया था। मुनि ने इसके बारे में पूछा तो युवतियों ने जवाब दिया कि उनका पुत्र पवित्र है और जब वह उनकी ओर देख रहा था, तब उसने स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं माना। लेकिन मुनि तो भेद मान रहे थे।
When Srila Vyasadeva was following his son, the beautiful young women bathing nude covered their bodies with clothes, although Vyasadeva himself was not nude. But they did not do so when his son passed by. When the Muni asked about this, the young women replied that their son was pure and when he was looking at them, he did not recognize any difference between man and woman. But the Muni was recognizing the difference.
तात्पर्य
भगवद्-गीता (5.18) में कहा गया है कि एक विद्वान ऋषि अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से एक विद्वान और सौम्य ब्राह्मण, एक चांडाल (कुत्ते को खाने वाला), एक कुत्ते या एक गाय को समान रूप से देखता है। श्रील शुकदेव गोस्वामी ने उस अवस्था को प्राप्त किया। इस तरह उन्होंने नर या नारी नहीं देखा; उन्होंने सभी जीवित संस्थाओं को अलग-अलग वेश में देखा। नहा रही महिलाएं सिर्फ उनके व्यवहार का अध्ययन करके ही किसी पुरुष के मन को समझ सकती थीं। जिस तरह एक बच्चे को देखकर कोई समझ सकता है कि वह कितना मासूम है। शुकदेव गोस्वामी सोलह वर्ष के एक युवा लड़के थे, और इसलिए उनके शरीर के सभी अंग विकसित थे। वह नग्न भी थे, और महिलाएं भी नग्न थीं। लेकिन क्योंकि शुकदेव गोस्वामी यौन संबंधों से परे थे, वे बहुत मासूम दिखाई दिए। महिलाएं, अपनी विशेष योग्यताओं से, इसे एक साथ समझ सकती थीं, और इसलिए वे उनके बारे में बहुत चिंतित नहीं थीं। लेकिन जब उनके पिता गुजरे, तो महिलाओं ने जल्दी से कपड़े पहन लिए। महिलाएं हूबहू उनकी संतान या पोती जैसी थीं, फिर भी उन्होंने व्यासदेव की उपस्थिति पर सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार प्रतिक्रिया दी क्योंकि श्रील व्यासदेव एक गृहस्थ की भूमिका निभाते थे। एक गृहस्थ को नर और नारी के बीच अंतर करना पड़ता है; अन्यथा वह गृहस्थ नहीं हो सकता। इसलिए व्यक्ति को नर और नारी के लिए किसी भी लगाव के बिना शरीर और आत्मा के बीच के अंतर को जानने का प्रयास करना चाहिए। जब तक ऐसा भेदभाव होता है, तब तक किसी को भी शुकदेव गोस्वामी की तरह संन्यासी बनने का प्रयास नहीं करना चाहिए। कम से कम सैद्धांतिक रूप से किसी को यह विश्वास होना चाहिए कि एक जीव न तो नर है और न ही नारी। विपरीत लिंग को आकर्षित करने और इस तरह व्यक्ति को भौतिक अस्तित्व में उलझाए रखने के लिए भौतिक प्रकृति द्वारा बाहरी रूप पदार्थ से बना है। एक मुक्त आत्मा इस विकृत भेद से ऊपर है। वह एक जीवित प्राणी और दूसरे के बीच अंतर नहीं करता है। उसके लिए वे सभी एक और एक ही आत्मा हैं। इस आध्यात्मिक दृष्टि की पूर्णता मुक्त अवस्था है, और श्रील शुकदेव गोस्वामी ने उस अवस्था को प्राप्त किया। श्रील व्यासदेव भी दिव्य स्तर पर थे, लेकिन क्योंकि वे गृहस्थ के जीवन में थे, इसलिए उन्होंने रीति-रिवाज के अनुसार, एक मुक्त आत्मा होने का दिखावा नहीं किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥