जैसा कि पहले कहा गया था, सरस्वती नदी के किनारे कृष्णद्वैपायन व्यास की कुटिया में नारद जी तब पहुंचे जब व्यासदेव अपने दोषों के लिए पश्चाताप कर रहे थे।
As has been stated earlier, when Vyasa was repenting for his faults, at that very time Narada arrived at the hut of Krishnadwaipayana Vyasa situated on the bank of the river Saraswati.
तात्पर्य
व्यासदेव को जो खालीपन महसूस हुआ, वह उनके ज्ञान की कमी के कारण नहीं था। भागवत-धर्म विशुद्ध रूप से प्रभु की भक्तिमय सेवा है जिस तक अद्वैतवादी की कोई पहुँच नहीं होती है। अद्वैतवादियों को परमहंसों (सन्यास के सर्वाधिक उत्तम आश्रम) में नहीं गिना जाता है। श्रीमद्भागवतम, भगवान के दिव्य कर्मों का वर्णन से भरा हुआ है। यद्यपि व्यासदेव एक अधिकार प्राप्त देवता थे, फिर भी उन्होंने असंतोष महसूस किया क्योंकि उनके किसी भी कार्य में प्रभु के दिव्य कार्यों की उचित व्याख्या नहीं की गई थी। प्रेरणा श्री कृष्ण द्वारा सीधे व्यासदेव के हृदय में स्थापित की गई थी, और इस प्रकार उन्हें उपर्युक्त रूप से बताए गए शून्यता का अनुभव हुआ। यह यहाँ स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है कि प्रभु की दिव्य प्रेममय सेवा के बिना, सब कुछ व्यर्थ है; लेकिन प्रभु की दिव्य सेवा में, फलदायी कार्य या अनुभवजन्य दार्शनिक अटकलों के बिना ही सब कुछ मूर्त हो जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥