किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिता: ।
प्रिया: परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रिया: ॥ ३१ ॥
अनुवाद
शायद मैंने भगवान की भक्ति के बारे में विशेष रूप से नहीं बताया हो जो सम्पूर्ण जीवों और अच्युत भगवान को प्रिय है।
I may not have specifically indicated the devotional service to the Lord, which is dear to both the perfected beings and the infallible Lord.
तात्पर्य
श्रील व्यासदेव द्वारा अनुभव की जा रही असंतुष्टि यहां उनके स्वयं के शब्दों में व्यक्त की गई है। यह भगवान की भक्ति सेवा में जीवित प्राणी की सामान्य स्थिति के लिए महसूस किया गया था। जब तक कोई सेवा की सामान्य स्थिति में स्थिर नहीं हो जाता, तब तक न तो भगवान और न ही जीवित प्राणी पूरी तरह से संतुष्ट हो सकते हैं। यह दोष उनके द्वारा तब महसूस किया गया जब उनके आध्यात्मिक गुरु नारद मुनि उनसे मिले। इसका वर्णन इस प्रकार है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥