तथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवात्मना विभु: ।
असम्पन्न इवाभाति ब्रह्मवर्चस्य सत्तम: ॥ ३० ॥
अनुवाद
यद्यपि मैं वेदों में वर्णित सभी आवश्यकताओं से पूरी तरह से सुसज्जित हूँ, फिर भी मैं अधूरापन महसूस कर रहा हूँ।
Although I am fully equipped with all the things required for the Vedas, yet I feel incomplete.
तात्पर्य
निस्संदेह श्रील व्यासदेव सभी वैदिक उपलब्धियों के विवरण में पूर्ण थे। पदार्थ में निमग्न प्राणियों का शोधन वेदों में बताई गई क्रियाओं द्वारा संभव है, लेकिन अंतिम उपलब्धि अलग है। जब तक इसे प्राप्त नहीं किया जाता है, तब तक जीव, भले ही पूरी तरह से सुसज्जित हो, उसे अतिमानसिक रूप से सामान्य अवस्था में नहीं रखा जा सकता। श्रील व्यासदेव ने सुराग खो दिया था और इसलिए असंतोष महसूस किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥