श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.4.25 
स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।
कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह ।
इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
महान ऋषि ने करुणा के वश होकर यह उचित समझा कि यह मनुष्यों को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता करेगा। इसलिए, उन्होंने स्त्रियों, श्रमिकों और द्विज-बन्धुओं के लिए महाभारत नामक महान ऐतिहासिक कहानी का संकलन किया।
 
Maharishi, out of compassion, thought it beneficial that this would help humans achieve the ultimate goal of life. Thus, he compiled the great historical story called Mahabharata for women, Shudras and Dwij brothers.
तात्पर्य
दंडी परिवारों के मित्र वही होते हैं जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य परिवारों में या अध्यात्मिक रूप से सुसंस्कृत परिवारों में जन्म लेते हैं, लेकिन स्वयं अपने पूर्वजों के समान नहीं होते। ऐसे वंशजों को शुद्धिकरण प्राप्तियों की कमी के कारण इस तरह से नहीं पहचाना जाता है। शुद्धिकरण गतिविधियाँ एक बच्चे के जन्म से पहले ही शुरू हो जाती हैं, और बीज देने वाली सुधारात्मक प्रक्रिया को गर्भाधान-संस्कार कहा जाता है। जिसने इस तरह के गर्भाधान-संस्कार, या आध्यात्मिक परिवार नियोजन से नहीं गुजरा है, उसे वास्तविक दो बार जन्म लेने वाले परिवार के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है। गर्भाधान-संस्कार के बाद अन्य शुद्धिकरण प्रक्रियाएँ होती हैं, जिनमें से पवित्र धागा समारोह एक है। यह आध्यात्मिक दीक्षा के समय किया जाता है। इस ख़ास संस्कार के बाद ही आदमी को दो बार जन्म लेने वाला कह सकते हैं। एक जन्म की गणना बीज देने के संस्कार के दौरान की जाती है, और दूसरे जन्म की गणना आध्यात्मिक दीक्षा के समय की जाती है। जो ऐसे महत्वपूर्ण संस्कारों से गुजरने में सक्षम रहा हो, उसे वास्तविक रूप से दो बार जन्म लेने वाला कहा जा सकता है।

यदि पिता और माता आध्यात्मिक परिवार नियोजन की प्रक्रिया नहीं करते हैं और केवल जुनून के कारण बच्चे पैदा करते हैं, तो उनके बच्चों को द्विज-बंधु कहा जाता है। ये द्विज-बंधु निश्चित रूप से नियमित रूप से दो बार जन्म लेने वाले परिवारों के बच्चों की तरह बुद्धिमान नहीं होते हैं। द्विज-बंधुओं को शूद्रों और स्त्री वर्ग के साथ वर्गीकृत किया जाता है, जो स्वभाव से कम बुद्धिमान होते हैं। शूद्रों और स्त्री वर्ग को विवाह के समारोह को छोड़कर किसी भी संस्कार से गुजरने की ज़रूरत नहीं है।

कम बुद्धिमान वर्ग के लोग, अर्थात् स्त्रियाँ, शूद्र और उच्च जातियों के अयोग्य पुत्र, पारलौकिक वेदों के उद्देश्य को समझने के लिए आवश्यक योग्यताओं से रहित होते हैं। उनके लिए महाभारत तैयार किया गया था। महाभारत का उद्देश्य वेदों के उद्देश्य का संचालन करना है, और इसलिए इस महाभारत के भीतर भगवद्-गीता का सारांश वेद रखा गया है। कम बुद्धिमान लोग दर्शन की अपेक्षा कहानियों में अधिक रुचि रखते हैं, और इसलिए भगवद्-गीता के रूप में वेदों का दर्शन भगवान श्री कृष्ण द्वारा बोला गया है। व्यासदेव और भगवान कृष्ण दोनों आध्यात्मिक स्तर पर हैं, और इसलिए उन्होंने इस युग की पतित आत्माओं का भला करने के लिए सहयोग किया। भगवद्-गीता सभी वैदिक ज्ञान का सार है। यह आध्यात्मिक मूल्यों की पहली किताब है, जैसे उपनिषद हैं। वेदांत दर्शन आध्यात्मिक स्नातकों द्वारा अध्ययन का विषय है। केवल स्नातकोत्तर आध्यात्मिक छात्र ही भगवान की आध्यात्मिक या भक्ति सेवा में प्रवेश कर सकते हैं। यह एक महान विज्ञान है, और महान प्रोफेसर स्वयं भगवान हैं, जो भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में हैं। और जो लोग उनके द्वारा सशक्त किए जाते हैं, वे दूसरों को भगवान की अलौकिक प्रेम सेवा में दीक्षा दे सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)