यदि पिता और माता आध्यात्मिक परिवार नियोजन की प्रक्रिया नहीं करते हैं और केवल जुनून के कारण बच्चे पैदा करते हैं, तो उनके बच्चों को द्विज-बंधु कहा जाता है। ये द्विज-बंधु निश्चित रूप से नियमित रूप से दो बार जन्म लेने वाले परिवारों के बच्चों की तरह बुद्धिमान नहीं होते हैं। द्विज-बंधुओं को शूद्रों और स्त्री वर्ग के साथ वर्गीकृत किया जाता है, जो स्वभाव से कम बुद्धिमान होते हैं। शूद्रों और स्त्री वर्ग को विवाह के समारोह को छोड़कर किसी भी संस्कार से गुजरने की ज़रूरत नहीं है।
कम बुद्धिमान वर्ग के लोग, अर्थात् स्त्रियाँ, शूद्र और उच्च जातियों के अयोग्य पुत्र, पारलौकिक वेदों के उद्देश्य को समझने के लिए आवश्यक योग्यताओं से रहित होते हैं। उनके लिए महाभारत तैयार किया गया था। महाभारत का उद्देश्य वेदों के उद्देश्य का संचालन करना है, और इसलिए इस महाभारत के भीतर भगवद्-गीता का सारांश वेद रखा गया है। कम बुद्धिमान लोग दर्शन की अपेक्षा कहानियों में अधिक रुचि रखते हैं, और इसलिए भगवद्-गीता के रूप में वेदों का दर्शन भगवान श्री कृष्ण द्वारा बोला गया है। व्यासदेव और भगवान कृष्ण दोनों आध्यात्मिक स्तर पर हैं, और इसलिए उन्होंने इस युग की पतित आत्माओं का भला करने के लिए सहयोग किया। भगवद्-गीता सभी वैदिक ज्ञान का सार है। यह आध्यात्मिक मूल्यों की पहली किताब है, जैसे उपनिषद हैं। वेदांत दर्शन आध्यात्मिक स्नातकों द्वारा अध्ययन का विषय है। केवल स्नातकोत्तर आध्यात्मिक छात्र ही भगवान की आध्यात्मिक या भक्ति सेवा में प्रवेश कर सकते हैं। यह एक महान विज्ञान है, और महान प्रोफेसर स्वयं भगवान हैं, जो भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में हैं। और जो लोग उनके द्वारा सशक्त किए जाते हैं, वे दूसरों को भगवान की अलौकिक प्रेम सेवा में दीक्षा दे सकते हैं।
