शौनक उवाच
सूत सूत महाभाग वद नो वदतां वर ।
कथां भागवतीं पुण्यां यदाह भगवाञ्छुक: ॥ २ ॥
अनुवाद
शौनक ने कहा: हे सूत गोस्वामी, आप उन सभी में सबसे भाग्यशाली और सम्मानित हैं जो बोल सकते हैं और सुन सकते हैं। कृपया श्रीमद्-भागवतम की पुण्य कथा कहें, जिसे महान और शक्तिशाली ऋषि शुकदेव गोस्वामी ने सुनाया था।
Shaunak said: O Suta Goswami, you are the most fortunate and honourable among all those who can speak and narrate. Kindly narrate the holy story of Shrimadbhagavat, which was narrated by the great and powerful sage Sukadeva Goswami.
तात्पर्य
शौनक गोस्वामी ने अपनी अत्यधिक खुशी के कारण सूत गोस्वामी को दो बार संबोधित किया क्योंकि वह और सभा के सदस्य शुकादेव गोस्वामी द्वारा बोले गए भागवत के पाठ को सुनने के लिए उत्सुक थे। वे इसे किसी नकली व्यक्ति से सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते थे जो अपनी सुविधानुसार अपने तरीके से इसकी व्याख्या करता। आमतौर पर कथित रूप से भागवत के पाठी या तो पेशेवर पाठक होते हैं या कथित विद्वान, जो कि निष्पक्षवादी होते हैं और परमपुरुष की दिव्य, व्यक्तिगत गतिविधियों में प्रवेश नहीं कर सकते। ऐसे निष्पक्षवादी भागवत से कुछ अर्थों को तोड़-मरोड़कर निष्पक्षवादी विचारों का समर्थन करने के लिए प्रस्तुत करते हैं और पेशेवर पाठक तुरंत दसवें कांड में चले जाते हैं ताकि प्रभु के मनोरंजनों के सबसे गोपनीय भाग की गलत व्याख्या की जा सके। भागवत का पाठ करने के लिए ये दोनों ही पाठक प्रामाणिक व्यक्ति नहीं हैं। केवल वही व्यक्ति जो शुकादेव गोस्वामी के प्रकाश में भागवत प्रस्तुत करने के लिए तैयार है और केवल वही जो शुकादेव गोस्वामी और उनके प्रतिनिधि को सुनने के लिए तैयार हैं ये श्रीमद्-भागवत के दिव्य विमर्श में अच्छे प्रतिभागी हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥