श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 4: श्री नारद का प्राकट्य  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.4.19 
चातुर्होत्रं कर्म शुद्धं प्रजानां वीक्ष्य वैदिकम् ।
व्यदधाद्यज्ञसन्तत्यै वेदमेकं चतुर्विधम् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने देखा कि वेदों में वर्णित यज्ञ वे माध्यम है जिनके जरिये लोगों के काम-धंधों को पवित्र किया जा सकता है। अतः इस विधि को आसान बनाने के लिए ही उन्होंने एक ही वेद के चार भाग कर दिए जिससे वो लोगों के बीच फैल सकें।
 
He observed that the yajnas described in the Vedas are the means by which people's instincts can be purified. So, to simplify this method, he divided the same Veda into four parts so that it could be spread among the people.
तात्पर्य
प्राचीन काल में केवल यजुर्वेद ही था जिसमें यज्ञ के चारों विभागों का स्पष्ट उल्लेख था। किंतु उन्हें सरलता से पूर्ण कर सकने हेतु चारों आश्रमों के कर्मों को शुद्ध करने के लिए वेदों का चार प्रकार के कर्मों में विभाजन किया गया। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद नामक चारों वेदों से श्रेष्ठ वेदांत, पुराण, महाभारत, संहिता आदि का समूह पंचम वेद के रूप में जाना जाता है। श्री व्यासदेव और उनके अनेक शिष्य साक्षात् रूप से इस संसार में उपस्थित हुए थे तथा इस कलियुग के भ्रष्ट प्राणियों के प्रति उनमें अत्यधिक दया थी। यही कारण है कि वेदों के उपदेशों को ही उदाहरण के रूप में लेकर पुराणों और महाभारतों का निर्माण किया गया। यह संदेह करना कि पुराण और महाभारत वेदों के অंग हैं या नहीं, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। छान्दोग्य उपनिषद (7.1.4) में पुराणों और महाभारतों का, जो प्राय: इतिहास के रूप में जाने जाते हैं, पंचम वेद के रूप में उल्लेख किया गया है। श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, शास्त्रों के प्रामाण्य को इसी रूप में निर्णीत किया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)