वैदिक मंत्रों और पुराणों तथा इतिहासों में बताई गई बातों में भी कोई अंतर नहीं है। श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, माध्यंदिन-श्रुति में वर्णित है कि सभी वेद, जैसे - साम, अथर्व, ऋग, यजु, पुराण, इतिहास, उपनिषद इत्यादि, परमेश्वर के श्वास से उत्पन्न हुए हैं। एकमात्र अंतर यह है कि वैदिक मंत्र सामान्यतः प्रणव ॐकार से शुरू होते हैं, और वैदिक मंत्रों के छंदात्मक उच्चारण का अभ्यास करने के लिए कुछ प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि श्रीमद्-भागवतम् वैदिक मंत्रों से कम महत्व का है। इसके विपरीत, यह सभी वेदों का पका हुआ फल है, जैसा कि पहले बताया गया है। इसके अलावा, सबसे पूर्ण रूप से मुक्त आत्मा, श्रील शुकदेव गोस्वामी, भागवतम् के अध्ययन में लीन हैं, यद्यपि वे पहले से ही आत्म-साक्षात्कारित हैं। श्रील सूत गोस्वामी उनके पदचिह्नों पर चल रहे हैं, और इसलिए उनकी स्थिति कम से कम महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि वह छंदात्मक उच्चारण के साथ वैदिक मंत्रों के जाप में निपुण नहीं थे, जो वास्तविक साक्षात्कार से अधिक अभ्यास पर निर्भर करता है। तोता की तरह जपने से साक्षात्कार अधिक महत्वपूर्ण है।
