श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.3.9 
तुर्ये धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी ।
भूत्वात्मोपशमोपेतमकरोद्दुश्चरं तप: ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
चौथे अवतार में श्री कृष्ण राजा धर्म की पत्नी के जुड़वाँ पुत्र नर और नारायण के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने इंद्रियों को अपने वश में करने के लिए कठोर और अनुकरणीय तपस्या की।
 
In the fourth incarnation, the Lord became the twin sons of King Dharma's wife, Nara and Narayana. Then he performed difficult and exemplary penance to control the senses.
तात्पर्य
जैसे राजा ऋषभ ने अपने पुत्रों को सलाह दी, तपस्या या तपस्या का स्वैच्छिक स्वीकृति परमात्मा के साक्षात्कार के लिए मानव कर्तव्य मात्र है; उसने स्वयं भगवान द्वारा अनुकरणीय ढंग से किया गया था ताकि हमें सिखाया जा सके। भगवान भुलक्कड आत्माओं के प्रति बहुत दयालु हैं। इसलिए वह स्वयं आते हैं और उनके पीछे आवश्यक निर्देश छोड़ते हैं और भगवत में सभी बंधी आत्माओं को वापस बुलाने के लिए अपने अच्छे बेटों को प्रतिनिधियों के रूप में भेजते हैं। हाल ही में, सभी की स्मृति में, भगवान चैतन्य भी उसी उद्देश्य के लिए प्रकट हुए: लोहे के उद्योग के इस युग की पतित आत्माओं पर विशेष अनुग्रह दिखाने के लिए। नारायण के अवतार को हिमालय की श्रृंखला पर, बदरी-नारायण में अभी भी पूजा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)