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श्लोक 1.3.5  |
एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् ।
यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादय: ॥ ५ ॥ |
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| अनुवाद |
| यह स्वरूप (पुरुष का दूसरा प्रकट होना) ब्रह्मांड के अंदर विभिन्न अवतारों का स्रोत और अविनाशी बीज है। इस स्वरूप के कणों और अंशों से ही देवता, मनुष्य और अन्य विभिन्न जीवों की उत्पत्ति होती है। |
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| यह स्वरूप (पुरुष का दूसरा प्रकट होना) ब्रह्मांड के अंदर विभिन्न अवतारों का स्रोत और अविनाशी बीज है। इस स्वरूप के कणों और अंशों से ही देवता, मनुष्य और अन्य विभिन्न जीवों की उत्पत्ति होती है। |
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