इस सृष्टि के प्रमुख मनु इस प्रकार हैं: यज्ञ (स्वायंभुव मनु), विभु (स्वारोचिष मनु), सत्यसेन (उत्तम मनु), हरि (तामस मनु), वैंकुन्ट (रैवत मनु), अजित (चाक्षुष मनु), वामन (वैवस्वत मनु - वर्तमान युग वैवस्वत मनु का है), सर्वभौम (सावर्णि मनु), ऋषभ (दक्ष सावर्णि मनु), विश्वसेन (ब्रह्मा सावर्णि मनु), धर्मसेतु (धर्म सावर्णि मनु), सुधामा (रुद्र सावर्णि मनु), योगेश्वर (देव सावर्णि मनु) और बृहदभानु (इंद्र सावर्णि मनु)। उपरोक्त वर्णन के अनुसार ये चौदह मनुओं के एक समूह के नाम हैं जो 4,300,000,000 सौर वर्षों को कवर करते हैं।
इसके बाद युगावतार होते हैं, या सहस्राब्दियों के अवतार। युगों को सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग के रूप में जाना जाता है। प्रत्येक युग के अवतार विभिन्न रंग के होते हैं। रंग सफेद, लाल, काला और पीला होते हैं। द्वापरयुग में, काले रंग के भगवान कृष्ण प्रकट हुए, और कलियुग में पीले रंग के भगवान चैतन्य प्रकट हुए।
इसलिए भगवान के सभी अवतारों का उल्लेख प्रकट ग्रंथों में किया गया है। किसी धोखेबाज के अवतार बनने की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि एक अवतार का उल्लेख शास्त्रों में किया जाना चाहिए। एक अवतार स्वयं को भगवान का अवतार घोषित नहीं करता है, परन्तु महान ऋषि प्रकट ग्रंथों में वर्णित लक्षणों से सहमत होते हैं। अवतार की विशेषताएं और विशेष प्रकार का मिशन जिसे उसे निष्पादित करना होता है, प्रकट ग्रंथों में उल्लेखित हैं।
प्रत्यक्ष अवतारों के अलावा, असंख्य सशक्त अवतार हैं। उनका उल्लेख भी प्रकट ग्रंथों में किया गया है। ऐसे अवतार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भी अधिकृत होते हैं। जब वे सीधे अधिकृत होते हैं तो उन्हें अवतार कहा जाता है, परन्तु जब उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से अधिकृत किया जाता है तो उन्हें विभूतियाँ कहा जाता है। प्रत्यक्ष रूप से अधिकृत अवतार कुमार, नारद, पृथु, शेष, अनंत आदि हैं। जहाँ तक विभूतियों का संबंध है, उन्हें भगवद-गीता के विभूति-योग अध्याय में बहुत स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है। और इन सभी विभिन्न प्रकार के अवतारों के लिए, उद्गमस्थल गारभोदकशायी विष्णु है।
