श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.3.5 
एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् ।
यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्‍नरादय: ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
यह स्वरूप (पुरुष का दूसरा प्रकट होना) ब्रह्मांड के अंदर विभिन्न अवतारों का स्रोत और अविनाशी बीज है। इस स्वरूप के कणों और अंशों से ही देवता, मनुष्य और अन्य विभिन्न जीवों की उत्पत्ति होती है।
 
This form (second manifestation of Purusha) is the source of various incarnations and the indestructible seed within the universe. From the particles and parts of this form, various living beings like gods, humans etc. are born.
तात्पर्य
महात-तत्त्व में अनगिनत ब्रह्मांडों का सृजन करने के बाद, पुरुष उन प्रत्येक ब्रह्मांड में दूसरे पुरुष, गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में प्रवेश किया। जब उन्होंने देखा कि ब्रह्मांड के भीतर केवल अंधकार और आकाश है, जिसमें विश्राम करने की कोई जगह नहीं है, तो उन्होंने अपने ही पसीने से ब्रह्मांड के आधे हिस्से को पानी से भर दिया और उसी पानी पर लेट गए। इस पानी को गर्भोदक कहा जाता है। फिर उनकी नाभि से कमल के फूल का तना उग आया, और फूल की पंखुड़ियों पर ब्रह्मा का जन्म हुआ, जो सार्वभौमिक योजना के मास्टर इंजीनियर थे। ब्रह्मा ब्रह्मांड के इंजीनियर बने, और स्वयं भगवान ने विष्णु के रूप में ब्रह्मांड के रखरखाव का कार्य संभाला। ब्रह्मा, प्रकृति के रजोगुण या प्रकृति के जुनून के तरीके से उत्पन्न हुए, और विष्णु सद्गुण के स्वामी बने। विष्णु, सभी गुणों से परे हैं, इसलिए वे हमेशा भौतिकवादी स्नेह से अलग रहते हैं। यह पहले ही समझाया जा चुका है। ब्रह्मा से रुद्र (शिव) हैं, जो अज्ञान या अंधकार के प्रभारी हैं। वे भगवान की इच्छा से पूरी सृष्टि का नाश करते हैं। इसलिए, तीनों, ब्रह्मा, विष्णु और शिव, गर्भोदकशायी विष्णु के अवतार हैं। ब्रह्मा से अन्य देवता जैसे दक्ष, मरीचि, मनु और कई अन्य, ब्रह्मांड के भीतर जीवित संस्थाओं को उत्पन्न करने के लिए अवतार लेते हैं। इस गर्भोदकशायी विष्णु को वेदों में गर्भ-स्तुति के भजनों में महिमामंडित किया गया है, जो प्रभु के हजारों सिरों आदि के वर्णन से शुरू होता है। गर्भोदकशायी विष्णु ब्रह्मांड के स्वामी हैं, और यद्यपि वे ब्रह्मांड के भीतर लेटे हुए प्रतीत होते हैं, वे हमेशा पारलौकिक होते हैं। यह भी पहले ही समझाया जा चुका है। गर्भोदकशायी विष्णु का पूर्ण अंश जो विष्णु है, सार्वभौमिक जीवन का परमात्मा है, और उन्हें ब्रह्मांड के संवाहक या क्षीरसागरशायी विष्णु के रूप में जाना जाता है। इसलिए मूल पुरुष की तीन विशेषताओं को इस प्रकार समझा जाता है। और ब्रह्मांड के भीतर सभी अवतार क्षीरसागरशायी विष्णु से उत्पन्न होते हैं। अलग-अलग सहस्राब्दियों में अलग-अलग अवतार होते हैं, और वे असंख्य हैं, हालांकि उनमें से कुछ बहुत प्रमुख हैं, जैसे मत्स्य, कूर्म, वराह, राम, नृसिंह, वामन और कई अन्य। इन अवतारों को लीला अवतार कहा जाता है। फिर गुणात्मक अवतार हैं जैसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव (या रुद्र) जो भौतिक प्रकृति के विभिन्न तरीकों का कार्यभार संभालते हैं। भगवान विष्णु भगवान के व्यक्तित्व से भिन्न नहीं हैं। भगवान शिव भगवान के व्यक्तित्व और जीवित संस्थाओं या जीवों के बीच सीमांत स्थिति में हैं। ब्रह्मा हमेशा एक जीव-तत्त्व होते हैं। भगवान के सर्वोच्च पवित्र जीवित प्राणी, या भगवान के सबसे बड़े भक्त, को निर्माण की शक्ति दी जाती है, और उन्हें ब्रह्मा कहा जाता है। उनकी शक्ति मूल्यवान पत्थरों और गहनों में परिलक्षित सूर्य की शक्ति की तरह है। जब ब्रह्मा के पद का कार्यभार संभालने के लिए ऐसा कोई जीवित प्राणी नहीं होता है, तो स्वयं भगवान ब्रह्मा बन जाते हैं और पद का कार्यभार संभालते हैं। भगवान शिव एक साधारण जीवित प्राणी नहीं हैं। वे भगवान का पूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन क्योंकि भगवान शिव का भौतिक प्रकृति से सीधा संपर्क है, वे बिल्कुल भगवान विष्णु जैसी पारलौकिक स्थिति में नहीं हैं। अंतर दूध और दही के बीच जैसा है। दही तो दूध से ज्यादा कुछ नहीं है, और फिर भी इसे दूध के स्थान पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। अगले अवतार मनु हैं। ब्रह्मा के जीवन की एक दिन की अवधि के भीतर (जो हमारे सौर वर्ष द्वारा 4,300,000 × 1,000 वर्ष के रूप में गणना की जाती है) चौदह मनु होते हैं। इसलिए ब्रह्मा के एक महीने में 420 मनु और ब्रह्मा के एक वर्ष में 5,040 मनु होते हैं। ब्रह्मा अपने जीवन का एक सौ वर्ष जीते हैं, और इसलिए ब्रह्मा के जीवन की अवधि में 5,040 × 100 या 504,000 मनु होते हैं। असंख्य ब्रह्मांड हैं, जिनमें से प्रत्येक में एक ब्रह्मा है, और वे सभी पुरुष के श्वास के समय के दौरान सृजित और विनाश होते हैं। इसलिए कोई केवल कल्पना कर सकता है कि पुरुष की एक सांस के दौरान कितने लाखों मनु होते हैं।

इस सृष्टि के प्रमुख मनु इस प्रकार हैं: यज्ञ (स्वायंभुव मनु), विभु (स्वारोचिष मनु), सत्यसेन (उत्तम मनु), हरि (तामस मनु), वैंकुन्ट (रैवत मनु), अजित (चाक्षुष मनु), वामन (वैवस्वत मनु - वर्तमान युग वैवस्वत मनु का है), सर्वभौम (सावर्णि मनु), ऋषभ (दक्ष सावर्णि मनु), विश्वसेन (ब्रह्मा सावर्णि मनु), धर्मसेतु (धर्म सावर्णि मनु), सुधामा (रुद्र सावर्णि मनु), योगेश्वर (देव सावर्णि मनु) और बृहदभानु (इंद्र सावर्णि मनु)। उपरोक्त वर्णन के अनुसार ये चौदह मनुओं के एक समूह के नाम हैं जो 4,300,000,000 सौर वर्षों को कवर करते हैं।

इसके बाद युगावतार होते हैं, या सहस्राब्दियों के अवतार। युगों को सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग के रूप में जाना जाता है। प्रत्येक युग के अवतार विभिन्न रंग के होते हैं। रंग सफेद, लाल, काला और पीला होते हैं। द्वापरयुग में, काले रंग के भगवान कृष्ण प्रकट हुए, और कलियुग में पीले रंग के भगवान चैतन्य प्रकट हुए।

इसलिए भगवान के सभी अवतारों का उल्लेख प्रकट ग्रंथों में किया गया है। किसी धोखेबाज के अवतार बनने की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि एक अवतार का उल्लेख शास्त्रों में किया जाना चाहिए। एक अवतार स्वयं को भगवान का अवतार घोषित नहीं करता है, परन्तु महान ऋषि प्रकट ग्रंथों में वर्णित लक्षणों से सहमत होते हैं। अवतार की विशेषताएं और विशेष प्रकार का मिशन जिसे उसे निष्पादित करना होता है, प्रकट ग्रंथों में उल्लेखित हैं।

प्रत्यक्ष अवतारों के अलावा, असंख्य सशक्त अवतार हैं। उनका उल्लेख भी प्रकट ग्रंथों में किया गया है। ऐसे अवतार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भी अधिकृत होते हैं। जब वे सीधे अधिकृत होते हैं तो उन्हें अवतार कहा जाता है, परन्तु जब उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से अधिकृत किया जाता है तो उन्हें विभूतियाँ कहा जाता है। प्रत्यक्ष रूप से अधिकृत अवतार कुमार, नारद, पृथु, शेष, अनंत आदि हैं। जहाँ तक विभूतियों का संबंध है, उन्हें भगवद-गीता के विभूति-योग अध्याय में बहुत स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है। और इन सभी विभिन्न प्रकार के अवतारों के लिए, उद्गमस्थल गारभोदकशायी विष्णु है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)