हे विद्वान ब्राह्मणों, जब शुकदेव गोस्वामी ने वहाँ (महाराजा परीक्षित की उपस्थिति में) भागवत का पाठ किया तभी मैंने उसे कानों को पूरी तरह से सतर्क करके सुना था और इस तरह उनकी दयालुता से उस महान और परमज्ञानी ऋषि से भगवत को जान-समझ पाया। अब मैं वही सब तुम्हें सुनाने का प्रयास करूँगा जो मैंने उनसे सीखा और जैसा मैंने उसे आत्मसात किया है।
O learned brahmanas, when Sukadeva Goswami recited the Bhagavata there (in the presence of Maharaja Pariksit), I listened with great attention and thus by his grace I learnt the Bhagavata from that great, powerful sage. Now I shall try to narrate to you what I learnt from him and as I have imbibed it.
तात्पर्य
भगवद्पुराण के पृष्ठों पर भगवान श्री कृष्ण की उपस्थिति को व्यक्ति निश्चित रूप से तभी देख सकता है जब उसे शुकदेव गोस्वामी जैसे स्वाध्यायी महान आत्मा से सुना हो। हालाँकि, व्यक्ति भगवद्पुराण को किसी ऐसे भाड़े हुए पाठक से नहीं सीख सकता, जिसका जीवन उद्देश्य इस पाठ से केवल पैसा कमाना हो और वह कमाई कामुकता में लगाना चाहता हो। कोई भी व्यक्ति श्रीमद्भगवद्पुराण को नहीं सीख सकता है, जो कामुकता में लिप्त व्यक्तियों से जुड़ा हो। यह भगवद्पुराण सीखने का रहस्य है। न ही कोई व्यक्ति भगवद्पुराण को उस व्यक्ति से सीख सकता है, जो सांसारिक ज्ञान से पाठ की व्याख्या करता है। अगर कोई व्यक्ति निश्चित रूप से भगवान श्री कृष्ण को पृष्ठों पर देखना चाहता है, तो उसे शुकदेव गोस्वामी के प्रतिनिधि से भगवद्पुराण सीखना होगा, किसी और से नहीं। यही प्रक्रिया है, और इसका कोई विकल्प नहीं है। सूत गोस्वामी शुकदेव गोस्वामी के एक सच्चे प्रतिनिधि हैं, क्योंकि वह उस संदेश को प्रस्तुत करना चाहते हैं, जो उन्होंने एक महान विद्वान ब्राह्मण से प्राप्त किया। शुकदेव गोस्वामी ने भगवद्पुराण को वैसे ही प्रस्तुत किया, जैसे उन्होंने अपने महान पिता से सुना था, और इसी तरह सूत गोस्वामी भगवद्पुराण को वैसे ही प्रस्तुत कर रहे हैं, जैसे उन्होंने शुकदेव गोस्वामी से सुना था। सिर्फ सुनना ही सब कुछ नहीं है; व्यक्ति को उचित ध्यान से पाठ को समझना चाहिए। निविष्ट शब्द का अर्थ है कि सूत गोस्वामी ने अपने कानों से भगवद्पुराण का रस लिया। यह भगवद्पुराण को प्राप्त करने की वास्तविक प्रक्रिया है। व्यक्ति को वास्तविक व्यक्ति से ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए, और फिर वह एक बार भगवान कृष्ण की उपस्थिति को हर पृष्ठ पर महसूस कर सकता है। यहाँ भगवद्पुराण को जानने के रहस्य का उल्लेख किया गया है। कोई भी व्यक्ति ध्यानपूर्वक नहीं सुन सकता है, जो मन से शुद्ध नहीं है। कोई भी व्यक्ति मन से शुद्ध नहीं हो सकता, जो कर्म से शुद्ध नहीं है। कोई भी व्यक्ति कर्म से शुद्ध नहीं हो सकता, जो खाने, सोने, भय और संभोग में शुद्ध नहीं है। लेकिन किसी भी तरह यदि कोई व्यक्ति सही व्यक्ति से ध्यानपूर्वक सुनता है, तो शुरू में ही व्यक्ति भगवद्पुराण के पृष्ठों में भगवान श्री कृष्ण को निश्चित रूप से खुद देख सकता है।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध एक के अंतर्गत तीसरा अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥