श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.3.43 
कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभि: सह ।
कलौ नष्टद‍ृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदित: ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
यह भागवत पुराण सूर्य के समान तेजस्वी है और यह भगवान कृष्ण के अपने धाम जाने के बाद ही प्रकट हुआ, जो धर्म, ज्ञान आदि के साथ गए थे। जिन लोगों ने कलियुग की घोर अज्ञानता के कारण अपनी दृष्टि खो दी है, उन्हें इस पुराण से प्रकाश मिलेगा।
 
This Bhagavata Purana is as radiant as the Sun and it arose only after Krishna left for his abode along with Dharma, Gyan etc. Those who have lost their sight due to the intense darkness of ignorance in Kaliyug will get light from this Purana.
तात्पर्य
भगवान श्री कृष्ण का अपना शाश्वत धाम या निवास है, जहाँ वे अपने शाश्वत सहयोगियों और सामग्री सहित शाश्वत रूप से अपना आनंद लेते हैं। और उनका शाश्वत निवास उनकी आंतरिक ऊर्जा का एक प्रकटीकरण है, जबकि भौतिक दुनिया उनकी बाहरी ऊर्जा का एक प्रकटीकरण है। जब वे भौतिक दुनिया में उतरते हैं, तो वे अपनी आंतरिक शक्ति, जिसे आत्म-माया कहा जाता है, में अपनी सभी सामग्रियों के साथ स्वयं को प्रदर्शित करते हैं। भगवद-गीता में भगवान कहते हैं कि वे अपनी स्वयं की शक्ति (आत्म-माया) से उतरते हैं। इसलिए, उनका रूप, नाम, प्रसिद्धि, सामग्री, निवास आदि, पदार्थ की रचनाएँ नहीं हैं। वे गिरी हुई आत्माओं को पुनः प्राप्त करने और धर्म के कोड को फिर से स्थापित करने के लिए उतरते हैं जो सीधे उनके द्वारा बनाए गए हैं। भगवान को छोड़कर, कोई भी धर्म के सिद्धांतों को स्थापित नहीं कर सकता। या तो वह या उनके द्वारा अधिकृत एक उपयुक्त व्यक्ति ही धर्म के कोड को निर्देशित कर सकता है। वास्तविक धर्म का अर्थ है भगवान को जानना, उनके साथ हमारा संबंध और उनके संबंध में हमारे कर्तव्य और अंततः इस भौतिक शरीर को छोड़ने के बाद हमारे गंतव्य को जानना। सशर्त आत्माएँ, जो भौतिक ऊर्जा द्वारा फंसाई जाती हैं, शायद ही जीवन के इन सभी सिद्धांतों को जानती हैं। उनमें से अधिकांश जानवरों की तरह खाने, सोने, डरने और संभोग करने में लगे रहते हैं। वे ज्यादातर धार्मिकता, ज्ञान या मोक्ष के ढोंग के तहत इंद्रिय भोग में लिप्त रहते हैं। वे झगड़े या कलियुग के वर्तमान युग में अभी भी अधिक अंधे हैं। कलियुग में जनसंख्या जानवरों का सिर्फ एक शाही संस्करण है। उनका आध्यात्मिक ज्ञान या ईश्वरीय धार्मिक जीवन से कोई लेना-देना नहीं है। वे इतने अंधे होते हैं कि वे सूक्ष्म मन, बुद्धि या अहंकार के अधिकार क्षेत्र से परे कुछ भी नहीं देख सकते हैं, लेकिन उन्हें ज्ञान, विज्ञान और भौतिक समृद्धि में अपनी उन्नति पर बहुत गर्व है। वे वर्तमान शरीर को छोड़ने के तुरंत बाद कुत्ता या सूअर बनने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल सकते हैं, क्योंकि वे जीवन के अंतिम लक्ष्य को पूरी तरह से खो चुके हैं। भगवान श्री कृष्ण, कलियुग की शुरुआत से ठीक पहले हमारे सामने प्रकट हुए और कलियुग की व्यावहारिक रूप से शुरुआत के समय अपने शाश्वत घर लौट गए। जब वे उपस्थित थे, तो उन्होंने अपनी विभिन्न गतिविधियों से सब कुछ प्रदर्शित किया। उन्होंने विशेष रूप से भगवद-गीता का उच्चारण किया और धार्मिकता के सभी ढोंगी सिद्धांतों को मिटा दिया। और इस भौतिक दुनिया से जाने से पहले, उन्होंने नारद के माध्यम से श्री व्यासदेव को श्रीमद-भागवतम के संदेशों को संकलित करने का अधिकार दिया, और इस प्रकार भगवद-गीता और श्रीमद-भागवतम दोनों ही इस युग के अंधे लोगों के लिए मशालवाहकों की तरह हैं। दूसरे शब्दों में, यदि कलियुग के इस युग में लोग जीवन के वास्तविक प्रकाश को देखना चाहते हैं, तो उन्हें केवल इन दो पुस्तकों को ही अपनाना होगा, और उनके जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाएगा। भगवद-गीता, भागवतम का प्रारंभिक अध्ययन है। और श्रीमद-भागवतम जीवन का सर्वोपरि कल्याण है, भगवान श्री कृष्ण ने अवतार लिया है। इसलिए हमें श्रीमद-भागवतम को भगवान कृष्ण के प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व के रूप में स्वीकार करना चाहिए। जो व्यक्ति श्रीमद-भागवतम को देख सकता है, वह स्वयं भगवान श्री कृष्ण को भी देख सकता है। वे एक जैसे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)