सम्राट परीक्षित को अपनी मृत्यु के संबंध में जानकारी समय पर प्राप्त हो गई और उन्होंने तुरंत अपने राज्य और परिवार को त्याग दिया और गंगा के तट पर मृत्यु होने तक उपवास करने बैठ गए। उनके शाही पद की वजह से सभी महान ऋषि, दार्शनिक, रहस्यवादी आदि वहां पहुंचे। उन्होंने उनके तत्कालीन कर्तव्य के बारे में कई सुझाव दिए और आखिरकार यह तय हुआ कि वे शुकदेव गोस्वामी से भगवान कृष्ण के बारे में सुनेंगे। इस प्रकार उनको भागवतम का उपदेश दिया गया।
श्रीपाद शंकराचार्य, जिन्होंने मायावाद दर्शन का प्रचार किया और परम तत्व के अवैयक्तिक पहलू पर जोर दिया, उन्होंने भी यह सिफारिश की कि व्यक्ति को भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए, क्योंकि बहस से कोई लाभ की आशा नहीं है। अप्रत्यक्ष रूप से श्रीपाद शंकराचार्य ने स्वीकार किया कि उन्होंने वेदान्त-सूत्र की फूलदार व्याकरणिक व्याख्या में जो कुछ भी उपदेश दिया था, वह मृत्यु के समय किसी की मदद नहीं कर सकता। मृत्यु की नाजुक घड़ी पर गोविंद का नाम जपना चाहिए। यह सबसे महान पारमार्थिक लोगों की सिफारिश है। शुकदेव गोस्वामी ने बहुत पहले ही यह सत्य कहा था कि अंत में नारायण का स्मरण करना चाहिए। यही सभी आध्यात्मिक गतिविधियों का सार है। इस शाश्वत सत्य का अनुसरण करते हुए, श्रीमद्-भागवतम को सम्राट परीक्षित ने सुना, और इसे योग्य शुकदेव गोस्वामी ने सुनाया। भागवतम के संदेश वक्ता और प्राप्तकर्ता दोनों को उसी माध्यम से ठीक से पहुंचाया गया।
