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श्लोक 1.3.41  |
तदिदं ग्राहयामास सुतमात्मवतां वरम् ।
सर्ववेदेतिहासानां सारं सारं समुद्धृतम् ॥ ४१ ॥ |
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| अनुवाद |
| स्वरूपसिद्धों में अत्यंत सम्मानीय श्री व्यासदेव ने समस्त वैदिक साहित्य और ब्रह्मांड के इतिहासों का सार निकालकर इसे अपने पुत्र को प्रदान किया। |
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| स्वरूपसिद्धों में अत्यंत सम्मानीय श्री व्यासदेव ने समस्त वैदिक साहित्य और ब्रह्मांड के इतिहासों का सार निकालकर इसे अपने पुत्र को प्रदान किया। |
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