श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.3.41 
तदिदं ग्राहयामास सुतमात्मवतां वरम् ।
सर्ववेदेतिहासानां सारं सारं समुद्‍धृतम् ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
स्वरूपसिद्धों में अत्यंत सम्मानीय श्री व्यासदेव ने समस्त वैदिक साहित्य और ब्रह्मांड के इतिहासों का सार निकालकर इसे अपने पुत्र को प्रदान किया।
 
Sri Vyasdev, who is most respected among the Svarupasiddhas, extracted the essence of all the Vedic literature and the history of the universe and gave it to his son.
तात्पर्य
जिनके पास ज्ञान का भंडार कमजोर है, वे केवल बुद्धकाल अर्थात 600 ई.पू. के बाद से ही विश्व का इतिहास मानते हैं और इससे पहले के जो भी इतिहास शास्त्रों में वर्णित हैं, उन्हें वे केवल काल्पनिक कथा मानकर चलते हैं। यह तथ्य नहीं है। पुराण महाभारत आदि में जो कथाएँ वर्णित हैं वे इस पृथ्वी का ही वास्तविक इतिहास है। केवल पृथ्वी का ही नहीं, बल्कि ब्रह्मांड में स्थित लाखों-करोड़ों ग्रहों का भी इतिहास है। कभी-कभी इस जगत से बाहर के ग्रहों का इतिहास अविश्वसनीय लगता है। किंतु वे लोग यह नहीं जानते कि सभी ग्रह समान नहीं हैं और इसलिए अन्य ग्रहों के इतिहास संबंधी तथ्य इस पृथ्वी के अनुभव से मेल नहीं खाते हैं। भिन्न-भिन्न ग्रहों की परिस्थिति, काल-पात्र और स्थान की भिन्नता को देखते हुए पुराणों में वर्णित घटनाओं में कोई आश्चर्य की बात नहीं है और वे काल्पनिक भी नहीं है। हमें सदैव यह कहावत स्मरण रखनी चाहिए कि एक का भोजन दूसरे का विष होता है। इसलिए हमें पुराणों की कथाओं और इतिहास को काल्पनिक कहकर नहीं त्याग देना चाहिए। व्यास जैसे महामुनि का यह काम नहीं था कि वे अपनी साहित्य रचनाओं में काल्पनिक कथाएँ रखते। श्रीमद्भागवत में भिन्न-भिन्न ग्रहों के इतिहास से लिए हुए इतिहास तथ्यों का चित्रण किया गया है। इसीलिए इसे सभी आध्यात्मिक अधिकारियों ने महापुराण स्वीकार किया है। इन इतिहासों की विशेष महत्व की बात यह है कि सब भगवान् के भिन्न-भिन्न काल और पात्रों में स्थित विहारों से संबंधित हैं। श्रील शुकदेव गोस्वामी सभी आत्मज्ञानी महापुरुषों में सर्वश्रेष्ठ विभूति हैं और उन्होंने इसे अपने पिता व्यासदेव से अध्ययन का विषय ग्रहण किया था। श्रील व्यासदेव बड़े ही प्रधान आचार्य हैं और श्रीमद्भागवत का विषय इतना महत्वपूर्ण होने के कारण उन्होंने यह संदेश पहले अपने परम पुत्र श्रील शुकदेव गोस्वामी को सुनाया था। इसकी उपमा दूध के मक्खन से दी जाती है। वेद साहित्य ज्ञान के क्षीर सागर के समान है। मक्खन या घृत दूध का सबसे स्वादिष्ट सार है और श्रीमद्भागवत भी उसी प्रकार है क्योंकि इसमें भगवान् और उनके भक्तों के भिन्न-भिन्न विहारों का सारगर्भित, बोधप्रद और प्रमाणिक वृत्तांत है। किंतु अविश्वासी, नास्तिक और भागवत व्यापारी जो नर-नारियों के लिए व्यापार करते हैं-इन लोगों से भागवत संदेश लेने से कोई लाभ नहीं है। उसे श्रील शुकदेव गोस्वामी को सुनाया गया था और उनका भागवत व्यापार से कोई संबंध नहीं था। उन्हें व्यापार से परिवार का निर्वाह नहीं करना था। इसलिए श्रीमद्भागवत को शुकदेव के प्रतिनिधि से ही ग्रहण करना चाहिए, जो गृहभार रहित साधु संन्यासियों में हों। दूध तो निःसंदेह बहुत अच्छा और पौष्टिक है किंतु जब उस पर सर्प का मुख लग जाता है तो वह पौष्टिक नहीं रहता, वरन् मृत्यु का कारण बन जाता है। इसी प्रकार जो लोग वैष्णव व्यवस्था में नहीं हैं, उन्हें भागवत का व्यापार नहीं करना चाहिए और अनेक श्रोताओं की आध्यात्मिक मृत्यु का कारण नहीं बनना चाहिए। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि सभी वेदों का सार यही है कि भगवान् (श्रीकृष्ण) को जाना जाए और श्रीमद्भागवत स्वयं परम भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। इसलिए वह सभी वेदों का सार हैं और श्रीकृष्ण से संबंधित सभी काल के इतिहास तथ्यों का इसमें संग्रह है। वास्तव में वह सभी इतिहासों का सार है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)