| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 1: सृष्टि » अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण » श्लोक 4 |
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| | | | श्लोक 1.3.4  | पश्यन्त्यदो रूपमदभ्रचक्षुषा
सहस्रपादोरुभुजाननाद्भुतम् ।
सहस्रमूर्धश्रवणाक्षिनासिकं
सहस्रमौल्यम्बरकुण्डलोल्लसत् ॥ ४ ॥ | | | | | | अनुवाद | | भक्तजन अपनी निर्मल (सम्पूर्ण) आँखों से उस पुरुष के दिव्य स्वरूप को देखते हैं जिसके हजारों-हजार पाँव, जाँघें, भुजाएँ और मुख हैं और सभी अद्वितीय हैं। उस शरीर में हजारों सिर, आँखें, कान और नाकें हैं। वे हजारों मुकुटों और चमकते कुण्डलों से अलंकृत हैं और मालाओं से सजे हुए हैं। | | | | भक्तजन अपनी निर्मल (सम्पूर्ण) आँखों से उस पुरुष के दिव्य स्वरूप को देखते हैं जिसके हजारों-हजार पाँव, जाँघें, भुजाएँ और मुख हैं और सभी अद्वितीय हैं। उस शरीर में हजारों सिर, आँखें, कान और नाकें हैं। वे हजारों मुकुटों और चमकते कुण्डलों से अलंकृत हैं और मालाओं से सजे हुए हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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