पश्यन्त्यदो रूपमदभ्रचक्षुषा
सहस्रपादोरुभुजाननाद्भुतम् ।
सहस्रमूर्धश्रवणाक्षिनासिकं
सहस्रमौल्यम्बरकुण्डलोल्लसत् ॥ ४ ॥
अनुवाद
भक्तजन अपनी निर्मल (सम्पूर्ण) आँखों से उस पुरुष के दिव्य स्वरूप को देखते हैं जिसके हजारों-हजार पाँव, जाँघें, भुजाएँ और मुख हैं और सभी अद्वितीय हैं। उस शरीर में हजारों सिर, आँखें, कान और नाकें हैं। वे हजारों मुकुटों और चमकते कुण्डलों से अलंकृत हैं और मालाओं से सजे हुए हैं।
With their pure (perfect) eyes, the devotees see the divine form of the Purusha who has thousands of feet, thighs, arms and faces, all of which are unique. That body has thousands of heads, eyes, ears and noses. They are adorned with thousands of crowns and glittering earrings and decorated with garlands.
तात्पर्य
हम अपनी मौजूदा सांसारिक इंद्रियों द्वारा प्रत्यक्ष परमेश्वर के किसी भी पहलू को समझ नहीं सकते हैं। भक्ति सेवा की प्रक्रिया से हमारी मौजूदा इंद्रियों को सुधारा जाना चाहिए। और उसके बाद प्रभु स्वयं हमारे सामने प्रकट होते हैं। भगवद्गीता में इस बात की पुष्टि की गई है कि अलौकिक प्रभु को केवल शुद्ध भक्ति सेवा के माध्यम से ही जाना जा सकता है। और वेदों में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि केवल भक्ति सेवा के माध्यम से ही कोई व्यक्ति प्रभु के नज़दीक जा सकता है और केवल भक्ति सेवा ही उनका अनावरण कर सकती है। ब्रह्मा संहिता में भी कहा गया है कि प्रभु हमेशा ही उन भक्तों को दिखाई देते हैं जिनकी आँखें भक्ति सेवा के रंग से सराबोर हैं। इसलिए हमें प्रभु के अलौकिक स्वरूप की जानकारी उन लोगों से लेनी चाहिए जिन्होंने वास्तव में उन्हें भक्ति सेवा से सराबोर आंखों से देखा है। सांसारिक दुनिया में भी हम हमेशा चीज़ों को अपनी आँखों से नहीं देखते हैं, कभी-कभी हम उन लोगों के अनुभवों के माध्यम से देखते हैं जिन्होंने चीज़ों को वास्तव में देखा या किया है। यदि किसी सांसारिक चीज़ को समझने के लिए यही प्रक्रिया है तो यह प्रक्रिया अलौकिक मामलों में अधिक प्रभावी रूप से लागू की जा सकती है। इसलिए केवल धैर्य और दृढ़ता से ही हम परम सत्य और उनके विभिन्न स्वरूपों के संबंध में अलौकिक विषय को समझ सकते हैं। वह उन नौसिखियों के लिए निराकार होते हैं, लेकिन वह माहिर साधक के लिए अलौकिक स्वरूप में होते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥