श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  1.3.39 
अथेह धन्या भगवन्त इत्थं
यद्वासुदेवेऽखिललोकनाथे ।
कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावं
न यत्र भूय: परिवर्त उग्र: ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
इस दुनिया में, इस प्रकार की जिज्ञासाओं के माध्यम से ही व्यक्ति सफल और पूरी तरह से जानकार हो सकता है, क्योंकि ऐसी जिज्ञासाएं सभी ब्रह्मांडों के स्वामी भगवान के प्रति दिव्य आनंदमय प्रेम पैदा करती हैं और जन्म-मृत्यु के भयानक दोहराव से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देती हैं।
 
इस दुनिया में, इस प्रकार की जिज्ञासाओं के माध्यम से ही व्यक्ति सफल और पूरी तरह से जानकार हो सकता है, क्योंकि ऐसी जिज्ञासाएं सभी ब्रह्मांडों के स्वामी भगवान के प्रति दिव्य आनंदमय प्रेम पैदा करती हैं और जन्म-मृत्यु के भयानक दोहराव से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देती हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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