केवल वे ही संसार के रचयिता की पूर्ण महिमा, शक्ति और दिव्यता को समझ सकते हैं जो अपने हाथों में रथ का चक्र धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में बिना हिचकिचाहट और बिना किसी बाधा के अनुकूल सेवा करते हैं।
Only he who unhesitatingly and uninterruptedly renders his obedient service to the feet of the Lord who holds the chariot's wheel in His hands can understand the full glory, power and divinity of the Creator of this universe.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण के अलौकिक नाम, रूप एवं लीलाओं को केवल वे विशुद्ध भक्त ही जान सकते हैं जो फलदायी कामों के परिणामों और मानसिक अटकलों से पूर्ण रूप से मुक्त हो चुके हैं। विशुद्ध भक्तों को प्रभु की निष्काम सेवा करने से अपने लिए कुछ पाने की कोई इच्छा नहीं होती। बिना किसी हिचकिचाहट के वे भगवान को लगातार सेवा प्रदान करते रहते हैं। भगवान के सृजन में हर कोई, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भगवान की सेवा में लगा हुआ है। भगवान के इस नियम का अपवाद कोई नहीं है। जो अप्रत्यक्ष रूप से सेवा प्रदान कर रहे हैं, वे भगवान के मायावी साधन द्वारा बाध्य होकर उनकी प्रतिकूल सेवा कर रहे हैं। लेकिन जो भगवान के प्रिय साधन के निर्देशन में प्रत्यक्ष रूप से उनकी सेवा कर रहे हैं, वे उनकी अनुकूल सेवा कर रहे हैं। ऐसे अनुकूल सेवक भगवान के भक्त हैं, और भगवान की कृपा से वे भगवान की दया से अतीन्द्रिय रहस्यों के क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं। लेकिन मानसिक अटकलें लगाने वाले हर समय अंधकार में ही रहते हैं। जैसा कि भगवद्-गीता में कहा गया है, भगवान स्वयं अपने प्रेममय स्नेह में भगवान की निरंतर संलग्नता के कारण विशुद्ध भक्तों को बोध के मार्ग की ओर ले जाते हैं। यही ईश्वर के राज्य में प्रवेश करने का रहस्य है। फलदायी कर्म और अटकलों से वहाँ प्रवेश नहीं हो सकता।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥