श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.3.37 
न चास्य कश्चिन्निपुणेन धातु-
रवैति जन्तु: कुमनीष ऊती: ।
नामानि रूपाणि मनोवचोभि:
सन्तन्वतो नटचर्यामिवाज्ञ: ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
अल्प ज्ञान वाले मूर्ख मनुष्य, किसी नाटक में पात्र की भांति अभिनय करने वाले भगवान के रूपों, नामों और गतिविधियों की दिव्य प्रकृति को नहीं समझ सकते। न ही वो लोग अपनी अटकलों या शब्दों से ऐसी बातों को व्यक्त कर सकते हैं।
 
Foolish men cannot know the transcendental nature of the Lord's forms, names and actions because of their limited knowledge, because they are acting like characters in a play. Nor can such men express such things by their reasoning or even by their speech.
तात्पर्य
पूर्ण सत्य या परम सत्य के पारमार्थिक स्वरूप को ठीक से कोई नहीं बता सकता है। इसलिए यह कहा जाता है कि वह मन और वाणी की अभिव्यक्ति से परे है। और फिर भी कुछ लोग, कम ज्ञान के कारण, अधूरे मानसिक अनुमान और उनकी गतिविधियों के दोषपूर्ण वर्णन द्वारा पूर्ण सत्य को समझने की इच्छा रखते हैं। आम आदमी के लिए उनकी गतिविधियाँ, प्रकट होना और गायब होना, उनके नाम, उनके रूप, उनका उपकरण, उनके व्यक्तित्व और उनके साथ जुड़ी हुई सभी चीज़ें रहस्यमय हैं। भौतिकवादियों के दो वर्ग हैं, अर्थात् साधनकर्मी और अनुभववादी दार्शनिक। साधनकर्मियों को परम सत्य के बारे में व्यावहारिक रूप से कोई जानकारी नहीं होती है, और मानसिक अनुमानक, साधनकर्मों में निराश होने के बाद, अपना मुंह पूर्ण सत्य की ओर करते हैं और मानसिक अनुमान द्वारा उन्हें जानने का प्रयास करते हैं। और इन सभी लोगों के लिए, परम सत्य एक रहस्य है, जैसे जादूगर की जादूगरी बच्चों के लिए एक रहस्य होती है। परम सत्ता की जादूगरी से ठगे जाने के कारण, अधर्मी, जो साधनकर्म और मानसिक अनुमान में बहुत निपुण हो सकते हैं, हमेशा अज्ञानता में रहते हैं। ऐसे सीमित ज्ञान के साथ, वे पारमार्थिकता के रहस्यमय क्षेत्र में प्रवेश करने में असमर्थ हैं। मानसिक अनुमानक स्थूल भौतिकवादियों या साधनकर्मियों की तुलना में थोड़े अधिक प्रगतिशील होते हैं, लेकिन क्योंकि वे भी माया के चंगुल में होते हैं, इसलिए वे यह मान लेते हैं कि कोई भी चीज़ जिसका कोई रूप, नाम और गतिविधियाँ हैं, वह भौतिक ऊर्जा का ही एक उत्पाद है। उनके लिए परम आत्मा निराकार, नामहीन और निष्क्रिय है। और क्योंकि ऐसे मानसिक अनुमानक प्रभु के पारमार्थिक नाम और रूप को सांसारिक नामों और रूपों के साथ समान करते हैं, वे वास्तव में अज्ञानता में हैं। इतने कम ज्ञान के साथ, सर्वोच्च सत्ता के वास्तविक स्वरूप तक कोई पहुँच नहीं है। जैसा कि भगवद्-गीता में कहा गया है, भगवान हमेशा एक पारमार्थिक स्थिति में रहते हैं, तब भी जब वे भौतिक दुनिया में होते हैं। लेकिन अज्ञानी लोग प्रभु को दुनिया के महान व्यक्तित्वों में से एक मानते हैं, और इस तरह वे भ्रम की ऊर्जा के द्वारा गुमराह हो जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)