स वा इदं विश्वममोघलील:
सृजत्यवत्यत्ति न सज्जतेऽस्मिन् ।
भूतेषु चान्तर्हित आत्मतन्त्र:
षाड्वर्गिकं जिघ्रति षड्गुणेश: ॥ ३६ ॥
अनुवाद
जिनके कर्म सदा निर्मल होते हैं, वही भगवान छहों इंद्रियों के स्वामी हैं और छहों ऐश्वर्यों से सम्पन्न हैं। वे विराट ब्रह्मांडों की रचना करते हैं, उनका पालन करते हैं और उनका नाश करते हैं, परंतु स्वयं उनसे कभी भी प्रभावित नहीं होते हैं। वे सभी जीवों के अंदर निवास करते हैं और सदैव स्वतंत्र रहते हैं।
The Lord whose actions are always untainted is the master of the six senses and is omnipotent with the six opulences. He creates the visible universes, maintains them and destroys them without being affected in the least. He exists within all living entities and is always independent.
तात्पर्य
प्रभु और जीवित प्राणियों के बीच मुख्य अंतर यह है कि प्रभु निर्माता हैं और जीवित प्राणी निर्मित हैं। यहाँ उन्हें अमोघ-लीला कहा गया है, जो दर्शाता है कि उनके निर्माण में कुछ भी निंदनीय नहीं है। जो लोग उनके निर्माण में बाधा उत्पन्न करते हैं, वे खुद परेशान होते हैं। वह सभी भौतिक कष्टों से परे हैं क्योंकि वह सभी छह वैभवों, अर्थात् धन, शक्ति, प्रसिद्धि, सौंदर्य, ज्ञान और त्याग से भरे हुए हैं और इस प्रकार वह इंद्रियों के स्वामी हैं। वह इन प्रकट हुए लोकों को उन जीवों को पुनः प्राप्त करने के लिए बनाता है जो उनमें तीन गुना कष्टों से पीड़ित हैं, उनका पालन पोषण करता है, और उचित समय पर उनका विनाश कर देता है, बिना ऐसे कार्यों से कम से कम प्रभावित हुए। वह इस भौतिक निर्माण से बहुत सतही रूप से जुड़ा हुआ है, जैसा कि कोई व्यक्ति बिना गंध वाले लेख से जुड़े बिना गंध सूंघता है। इसलिए, अधर्मी तत्व सभी प्रयासों के बावजूद कभी भी उनसे संपर्क नहीं कर सकते।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥