श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.3.35 
एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च ।
वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पते: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार विद्वान पुरुष उस अजन्मे और निष्क्रिय के जन्म और कार्यों का वर्णन करते हैं, जिन्हें वैदिक साहित्य में भी नहीं पाया जा सकता है। वे हृदय के स्वामी हैं।
 
In this way, learned men describe the births and deeds of the unborn and the non-doer, who are not even knowable to the Vedic literature. He is the lord of the heart.
तात्पर्य
भगवान और जीवित प्राणी दोनों ही अनिवार्य रूप से आध्यात्मिक हैं। इसलिए वे दोनों ही अमर हैं, और उनमें से किसी का जन्म या मृत्यु नहीं है। अंतर यह है कि भगवान के तथाकथित जन्म और विलुप्ति जीवित प्राणियों के जन्म और विलुप्ति के विपरीत हैं। जो जीवित प्राणी जन्म लेते हैं और फिर मृत्यु को स्वीकार करते हैं वे भौतिक प्रकृति के नियमों से बंधे होते हैं। लेकिन भगवान के तथाकथित प्रकट होने और विलुप्त होने भौतिक प्रकृति की क्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि भगवान की आंतरिक शक्ति के प्रदर्शन हैं। उन्हें महान ऋषियों द्वारा आत्म-साक्षात्कार के उद्देश्य से वर्णित किया जाता है। भगवद्-गीता में भगवान ने कहा है कि भौतिक संसार में उनका तथाकथित जन्म और उनकी गतिविधियाँ सभी पारलौकिक हैं। और केवल ऐसी गतिविधियों पर ध्यान करके ही व्यक्ति ब्राह्मण का साक्षात्कार प्राप्त कर सकता है और इस तरह भौतिक बंधन से मुक्त हो सकता है। श्रुतियों में कहा गया है कि जन्महीन जन्म लेता दिखाई देता है। सर्वोच्च के पास कुछ भी करने के लिए नहीं है, लेकिन क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है, सब कुछ उसके द्वारा स्वाभाविक रूप से किया जाता है जैसे स्वचालित रूप से किया गया हो। वास्तव में, भगवान के विभिन्न रूपों का प्रकटीकरण और विलुप्ति और उनकी विभिन्न गतिविधियाँ सभी गोपनीय हैं, यहाँ तक कि वैदिक साहित्य के लिए भी। फिर भी उन्हें भगवान द्वारा वातानुकूलित आत्माओं पर दया करने के लिए प्रदर्शित किया जाता है। हमें हमेशा भगवान की गतिविधियों के वर्णनों का लाभ उठाना चाहिए, जो सबसे सुविधाजनक और स्वादिष्ट रूप में ब्राह्मण पर ध्यान हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)