जब भी कोई व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से यह जान लेता है कि स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही शरीर शुद्ध आत्मा से जुड़े नहीं हैं, तो उस समय वह अपने आपको और साथ ही साथ प्रभु का भी दर्शन कर पाता है।
Whenever a man experiences through self-realization that both the gross and subtle bodies have nothing to do with the pure soul, at that time he sees himself as well as God.
तात्पर्य
स्व-साक्षात्कार और भौतिक भ्रम के बीच का अंतर स्व-शरीर के आकार में भौतिक ऊर्जा के अस्थायी या भ्रामक आरोपों को जानना है कि स्थूल और सूक्ष्म शरीर स्वयं के सतही आवरण हैं। अज्ञानता के कारण आवरण पड़ते हैं। इस तरह के आवरण भगवान के व्यक्तित्व में कभी भी प्रभावी नहीं होते है। इसे दृढ़तापूर्वक जानना मुक्ति कहलाता है या परम को देखना है। इसका अर्थ है कि ईश्वरीय या आध्यात्मिक जीवन को अपनाने से पूर्ण आत्म-साक्षात्कार संभव हो जाता है। आत्म-साक्षात्कार का अर्थ स्थूल और सूक्ष्म शरीर की जरूरतों के प्रति उदासीन होना और आत्म की गतिविधियों के बारे में गंभीर होना है। गतिविधियों के लिए प्रेरणा खुद से उत्पन्न होती है, लेकिन आत्म की वास्तविक स्थिति की अज्ञानता के कारण ऐसी गतिविधियां भ्रामक हो जाती हैं। अज्ञानता से, स्व-हित की गणना स्थूल और सूक्ष्म शरीर के संदर्भ में की जाती है, और इसलिए जीवन के बाद जीवन, गतिविधियों का एक पूरा सेट खराब हो जाता है। हालाँकि, जब कोई उचित संस्कृति से स्वयं से मिलता है, तो स्वयं की गतिविधियाँ शुरू होती हैं। इसलिए जो व्यक्ति स्वयं की गतिविधियों में लगा रहता है उसे जीवन-मुक्त, या सशर्त अस्तित्व में भी मुक्त व्यक्ति कहा जाता है। आत्म-साक्षात्कार की इस संपूर्ण अवस्था को कृत्रिम साधनों से नहीं, बल्कि भगवान के कमल चरणों में प्राप्त किया जाता है, जो हमेशा दिव्य होते हैं। भगवद-गीता में भगवान कहते हैं कि वह सभी के दिल में विराजमान हैं, और उसी से सारा ज्ञान, स्मरण या विस्मरण होता है। जब जीव भौतिक ऊर्जा (भ्रामक घटना) का भोगी बनने की इच्छा करता है, तो प्रभु जीव को विस्मरण के रहस्य में ढँक देते हैं, और इस प्रकार जीव स्थूल शरीर और सूक्ष्म मन को अपना मान लेता है। और दिव्य ज्ञान की संस्कृति द्वारा, जब जीव विस्मरण के चंगुल से मुक्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करता है, तो भगवान, अपनी अकारण दया से, जीव के भ्रामक पर्दे को हटाते हैं, और इस प्रकार वह अपने स्वयं को साकार करता है। फिर वह सशर्त जीवन से मुक्त होकर, अपनी शाश्वत संवैधानिक स्थिति में भगवान की सेवा में खुद को संलग्न करता है। यह सब प्रभु द्वारा या तो उनकी बाहरी शक्ति या आंतरिक शक्ति द्वारा सीधे निष्पादित किया जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥