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श्लोक 1.3.32  |
अत: परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।
अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात्स जीवो यत्पुनर्भव: ॥ ३२ ॥ |
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| अनुवाद |
| रूप का यह स्थूल स्वरूप उसके सूक्ष्म स्वरूप की तुलना में द्वितीय है, जो बिना रूप के होता है। इसे न देखा जा सकता है, न सुना जा सकता है और न ही किसी इंद्रिय द्वारा उसका अनुभव किया जा सकता है। जीव का सच्चा स्वरूप इस सूक्ष्मता से परे है। यदि ऐसा न होता तो उसे बार-बार जन्म नहीं लेना पड़ता। |
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| रूप का यह स्थूल स्वरूप उसके सूक्ष्म स्वरूप की तुलना में द्वितीय है, जो बिना रूप के होता है। इसे न देखा जा सकता है, न सुना जा सकता है और न ही किसी इंद्रिय द्वारा उसका अनुभव किया जा सकता है। जीव का सच्चा स्वरूप इस सूक्ष्मता से परे है। यदि ऐसा न होता तो उसे बार-बार जन्म नहीं लेना पड़ता। |
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