श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.3.32 
अत: परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।
अद‍ृष्टाश्रुतवस्तुत्वात्स जीवो यत्पुनर्भव: ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
रूप का यह स्थूल स्वरूप उसके सूक्ष्म स्वरूप की तुलना में द्वितीय है, जो बिना रूप के होता है। इसे न देखा जा सकता है, न सुना जा सकता है और न ही किसी इंद्रिय द्वारा उसका अनुभव किया जा सकता है। जीव का सच्चा स्वरूप इस सूक्ष्मता से परे है। यदि ऐसा न होता तो उसे बार-बार जन्म नहीं लेना पड़ता।
 
रूप का यह स्थूल स्वरूप उसके सूक्ष्म स्वरूप की तुलना में द्वितीय है, जो बिना रूप के होता है। इसे न देखा जा सकता है, न सुना जा सकता है और न ही किसी इंद्रिय द्वारा उसका अनुभव किया जा सकता है। जीव का सच्चा स्वरूप इस सूक्ष्मता से परे है। यदि ऐसा न होता तो उसे बार-बार जन्म नहीं लेना पड़ता।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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