श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.3.28 
एते चांशकला: पुंस: कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
उपरोक्त सभी अवतार या तो भगवान के पूर्ण अंश या पूर्ण अंश के भाग (कलाएं) हैं, लेकिन श्री कृष्ण तो मूल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं। जब भी नास्तिकों द्वारा उपद्रव होता है तो वे सभी ग्रहों पर प्रकट होते हैं। भगवान आस्तिकों की रक्षा करने के लिए अवतरित होते हैं।
 
All the above mentioned incarnations are either the complete parts of God or parts (kalas) of the complete part, but Shri Krishna is the original complete Purushottam God. He appears in all the different worlds when atheists create disturbance. God incarnates to protect theists.
तात्पर्य
इस खंड में सर्वोच्च भगवान्, श्री कृष्ण ने अन्य अवतारों से अपनी ख़ास पहचान बनाई है। उन्हें अवतारों में इसलिए गिना जाता है क्योंकि अपनी वजह रहित कृपा से भगवान अपने पारलौकिक वासस्थान से धरती पर उतरते हैं। अवतार का मतलब है, "वह जो उतरता है।" स्वयं भगवान समेत उनके सभी अवतार विशिष्ट मिशन को पूरा करने के लिए अलग-अलग ग्रहों और जीव-जंतुओं के रूप में इस भौतिक जगत में उतरते हैं। कभी वह स्वयं आते हैं, कभी उनके पूर्ण रूप के अंश या पूर्ण रूप के अंशों के हिस्से या उनके विभेदित हिस्से जो सीधे या परोक्ष रूप से उनसे शक्तिसंपन्न किए गए हैं, कुछ विशेष कार्य करने के लिए इस भौतिक जगत में उतरते हैं। मूल रूप से भगवान समस्त वैभवों, समस्त वीरता, समस्त यश, समस्त सुंदरता, समस्त ज्ञान और समस्त त्याग से भरपूर हैं। जब उनकी शक्तियां पूर्ण रूपों के ज़रिए या पूर्ण रूप के अंशों के ज़रिए प्रकट होती हैं, तो यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि विशिष्ट कार्यों के लिए उनकी भिन्न शक्तियों के प्रकटन की ज़रूरत होती है। जैसे एक कमरे में जब छोटे-छोटे इलेक्ट्रिक बल्ब जलते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं होता कि इलेक्ट्रिक पावरहाउस छोटे बल्बों तक ही सीमित है। वही पावरहाउस बड़े स्तर के औद्योगिक डायनेमो को भी बिजली आपूर्ति कर सकता है, जिनमें वोल्ट अधिक होते हैं। इसी तरह भगवान के अवतार सीमित शक्तियों को प्रदर्शित करते हैं क्योंकि उस समय उतनी ही शक्तियों की ज़रूरत होती है। उदाहरण के लिए, भगवान परशुराम और भगवान नृसिंह ने अवज्ञाकारी क्षत्रियों को इक्कीस बार मारकर और महान नास्तिक हिरण्यकशिपु को मारकर अपनी असाधारण संपन्नता का प्रदर्शन किया। हिरण्यकशिपु इतना शक्तिशाली था कि अन्य ग्रहों के देवता भी उसकी भौंह उठाने भर से ही कांप उठते थे। भौतिक अस्तित्व के उच्चतर स्तरों पर मौजूद देवता कई गुना अधिक अमीर, सुंदर, संपन्न, विलासी और अन्य सभी दृष्टियों से संपन्न इंसानों से श्रेष्ठ होते हैं। फिर भी वे हिरण्यकशिपु से डरते थे। इसलिए हम आसानी से कल्पना कर सकते हैं कि हिरण्यकशिपु इस भौतिक जगत में कितना शक्तिशाली था। लेकिन भगवान नृसिंह ने अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट डाला। इसका मतलब है कि भौतिक रूप से शक्तिशाली कोई भी भगवान के नाखूनों की ताकत बरदाश्त नहीं कर सकता। इसी तरह जामदग्न्य ने अपने राज्यों में सत्ता में बैठे अवज्ञाकारी राजाओं को मारने वाले भगवान की शक्ति का प्रदर्शन किया। भगवान के सशक्त अवतार नारद और पूर्ण अवतार वराह, साथ ही परोक्ष रूप से शक्तिसंपन्न भगवान बुद्ध ने जन-समूह में आस्था पैदा की। राम और धन्वंतरि के अवतारों ने उनके यश का प्रदर्शन किया और बलराम, मोहिनी और वामन ने उनकी सुंदरता का प्रदर्शन किया। दत्तात्रेय, मत्स्य, कुमार और कपिल ने उनके पारलौकिक ज्ञान का प्रदर्शन किया। नार और नारायण ऋषियों ने उनके त्याग का प्रदर्शन किया। इसलिए भगवान के सभी अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से शक्तिसंपन्न अवतारों ने अलग-अलग विशेषताओं को प्रकट किया, लेकिन मूल भगवान श्री कृष्ण ने ईश्वर की संपूर्ण विशेषताओं का प्रदर्शन किया और इस तरह उनकी यह पुष्टि होती है कि वह अन्य सभी अवतारों के स्रोत हैं। और भगवान श्री कृष्ण द्वारा प्रदर्शित सबसे असाधारण विशेषता गोपियों के साथ उनकी लीलाओं की आंतरिक शक्तिशाली अभिव्यक्ति थी। गोपियों के साथ उनकी लीलाएं पारलौकिक अस्तित्व, आनंद और ज्ञान का प्रदर्शन थीं, हालांकि वे जाहिरा तौर पर कामुक प्रेम के रूप में प्रदर्शित हुईं। गोपियों के साथ उनकी लीलाओं के विशिष्ट आकर्षण को कभी ग़लत नहीं समझा जाना चाहिए। दशम स्कंध में भागवत ने इन पारलौकिक लीलाओं का बयान किया है। और गोपियों के साथ भगवान कृष्ण की लीलाओं के पारलौकिक स्वरूप को समझने की स्थिति में पहुँचने के लिए भागवत अन्य नौ स्कंधों में छात्र को क्रमिक रूप से आगे ले जाता है।

श्रील जीव गोस्वामी के कथनानुसार, प्रामाणिक स्रोतों के अनुसार, भगवान कृष्ण अन्य सभी अवतारों के स्रोत हैं। ऐसा नहीं है कि भगवान कृष्ण के अवतार का कोई स्रोत है। पूर्ण परम सत्य के सभी लक्षण भगवान श्री कृष्ण के व्यक्तित्व में विद्यमान हैं, और भगवद्-गीता में भगवान स्पष्ट रूप से घोषणा करते हैं कि उनसे बड़ा या उनके समान कोई सत्य नहीं है। इस श्लोक में शब्द 'स्वयं' का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, यह पुष्टि करने के लिए कि भगवान कृष्ण का स्वयं से अन्य कोई स्रोत नहीं है। यद्यपि अन्य स्थानों पर, अवतारों को उनके विशेष कार्यों के कारण भगवान के रूप में वर्णित किया गया है, उन्हें सर्वोच्च व्यक्तित्व घोषित नहीं किया गया है। इस श्लोक में शब्द 'स्वयं' परम कल्याण रूपी सर्वोच्चता का प्रतीक है।

परम कल्याण कृष्ण बिना किसी दूसरे के एक हैं। उन्होंने स्वयं को विभिन्न हिस्सों, भागों और कणों में अपने आप को 'स्वयं-रूप', 'स्वयं-प्रकाश', 'तद-एकमा', 'प्रभाव', 'वैभव', 'विलास', 'अवतार', 'आवेश' और 'जीव' के रूप में विस्तारित किया है, सभी व्यक्तिगत और व्यक्तित्व के लिए उपयुक्त अनगिनत ऊर्जाओं से लैस हैं। पारलौकिक विषयों के विद्वान विद्वानों ने सावधानीपूर्वक परम कल्याण कृष्ण में साठ-चार प्रमुख विशेषताओं का विश्लेषण किया है। भगवान के सभी विस्तारों या श्रेणियों में इन विशेषताओं का केवल कुछ प्रतिशत है। लेकिन श्री कृष्ण शत-प्रतिशत विशेषताओं के स्वामी हैं। और उनके व्यक्तिगत विस्तार जैसे कि स्वयं-प्रकाश और तद-एकमा, सभी विष्णु-तत्त्व वाले अवतारों की श्रेणियों तक इन पारमार्थिक विशेषताओं के तेरह प्रतिशत तक के अधिकारी हैं। भगवान शिव, जो न अवतार हैं न आदेश और न ही उनके बीच हैं, उनके पास लगभग चौबीस प्रतिशत विशेषताएँ हैं। लेकिन जीव, या जीवन के विभिन्न स्तरों में व्यक्तिगत जीवित प्राणी, सत्तर-आठ प्रतिशत विशेषताओं की सीमा तक होते हैं। भौतिक अस्तित्व की वातानुकूलित स्थिति में, जीवित प्राणी इन विशेषताओं को बहुत कम मात्रा में रखता है, जो जीवित प्राणी के पवित्र जीवन के संदर्भ में भिन्न होते हैं। जीवित प्राणियों में सबसे परिपूर्ण ब्रह्मा है, जो एक ब्रह्मांड का सर्वोच्च प्रशासक है। उसके पास पूर्ण रूप से सत्तर-आठ प्रतिशत विशेषताएँ हैं। अन्य सभी देवताओं में कम मात्रा में समान विशेषताएं हैं, जबकि मनुष्यों में बहुत कम मात्रा में विशेषताएं होती हैं। मनुष्य के लिए पूर्णता का मानक सत्तर-आठ प्रतिशत तक विशेषताओं को पूर्ण रूप से विकसित करना है। जीवित प्राणी कभी भी शिव, विष्णु या भगवान कृष्ण जैसी विशेषताओं को धारण नहीं कर सकता है। जीवित प्राणी पूर्णता में सत्तर-आठ प्रतिशत पारलौकिक गुणों को विकसित करके ईश्वरीय बन सकता है, लेकिन वह कभी भी शिव, विष्णु या कृष्ण जैसे भगवान नहीं बन सकता है। वह नियत समय में ब्रह्मा बन सकता है। ईश्वरीय जीव जो सभी आध्यात्मिक आकाश में ग्रहों के निवासी हैं, हरि-धाम और महेश-धाम नामक विभिन्न आध्यात्मिक ग्रहों में भगवान के शाश्वत सहयोगी हैं। सभी आध्यात्मिक ग्रहों के ऊपर भगवान कृष्ण का निवास कृष्ण लोक या गोलोक वृंदावन कहलाता है, और पूर्ण जीवित प्राणी, उपरोक्त विशेषताओं के अठारह प्रतिशत को पूर्णता में विकसित करके, वर्तमान भौतिक शरीर को छोड़ने के बाद कृष्ण लोक के ग्रह में प्रवेश कर सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)