श्रील जीव गोस्वामी के कथनानुसार, प्रामाणिक स्रोतों के अनुसार, भगवान कृष्ण अन्य सभी अवतारों के स्रोत हैं। ऐसा नहीं है कि भगवान कृष्ण के अवतार का कोई स्रोत है। पूर्ण परम सत्य के सभी लक्षण भगवान श्री कृष्ण के व्यक्तित्व में विद्यमान हैं, और भगवद्-गीता में भगवान स्पष्ट रूप से घोषणा करते हैं कि उनसे बड़ा या उनके समान कोई सत्य नहीं है। इस श्लोक में शब्द 'स्वयं' का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, यह पुष्टि करने के लिए कि भगवान कृष्ण का स्वयं से अन्य कोई स्रोत नहीं है। यद्यपि अन्य स्थानों पर, अवतारों को उनके विशेष कार्यों के कारण भगवान के रूप में वर्णित किया गया है, उन्हें सर्वोच्च व्यक्तित्व घोषित नहीं किया गया है। इस श्लोक में शब्द 'स्वयं' परम कल्याण रूपी सर्वोच्चता का प्रतीक है।
परम कल्याण कृष्ण बिना किसी दूसरे के एक हैं। उन्होंने स्वयं को विभिन्न हिस्सों, भागों और कणों में अपने आप को 'स्वयं-रूप', 'स्वयं-प्रकाश', 'तद-एकमा', 'प्रभाव', 'वैभव', 'विलास', 'अवतार', 'आवेश' और 'जीव' के रूप में विस्तारित किया है, सभी व्यक्तिगत और व्यक्तित्व के लिए उपयुक्त अनगिनत ऊर्जाओं से लैस हैं। पारलौकिक विषयों के विद्वान विद्वानों ने सावधानीपूर्वक परम कल्याण कृष्ण में साठ-चार प्रमुख विशेषताओं का विश्लेषण किया है। भगवान के सभी विस्तारों या श्रेणियों में इन विशेषताओं का केवल कुछ प्रतिशत है। लेकिन श्री कृष्ण शत-प्रतिशत विशेषताओं के स्वामी हैं। और उनके व्यक्तिगत विस्तार जैसे कि स्वयं-प्रकाश और तद-एकमा, सभी विष्णु-तत्त्व वाले अवतारों की श्रेणियों तक इन पारमार्थिक विशेषताओं के तेरह प्रतिशत तक के अधिकारी हैं। भगवान शिव, जो न अवतार हैं न आदेश और न ही उनके बीच हैं, उनके पास लगभग चौबीस प्रतिशत विशेषताएँ हैं। लेकिन जीव, या जीवन के विभिन्न स्तरों में व्यक्तिगत जीवित प्राणी, सत्तर-आठ प्रतिशत विशेषताओं की सीमा तक होते हैं। भौतिक अस्तित्व की वातानुकूलित स्थिति में, जीवित प्राणी इन विशेषताओं को बहुत कम मात्रा में रखता है, जो जीवित प्राणी के पवित्र जीवन के संदर्भ में भिन्न होते हैं। जीवित प्राणियों में सबसे परिपूर्ण ब्रह्मा है, जो एक ब्रह्मांड का सर्वोच्च प्रशासक है। उसके पास पूर्ण रूप से सत्तर-आठ प्रतिशत विशेषताएँ हैं। अन्य सभी देवताओं में कम मात्रा में समान विशेषताएं हैं, जबकि मनुष्यों में बहुत कम मात्रा में विशेषताएं होती हैं। मनुष्य के लिए पूर्णता का मानक सत्तर-आठ प्रतिशत तक विशेषताओं को पूर्ण रूप से विकसित करना है। जीवित प्राणी कभी भी शिव, विष्णु या भगवान कृष्ण जैसी विशेषताओं को धारण नहीं कर सकता है। जीवित प्राणी पूर्णता में सत्तर-आठ प्रतिशत पारलौकिक गुणों को विकसित करके ईश्वरीय बन सकता है, लेकिन वह कभी भी शिव, विष्णु या कृष्ण जैसे भगवान नहीं बन सकता है। वह नियत समय में ब्रह्मा बन सकता है। ईश्वरीय जीव जो सभी आध्यात्मिक आकाश में ग्रहों के निवासी हैं, हरि-धाम और महेश-धाम नामक विभिन्न आध्यात्मिक ग्रहों में भगवान के शाश्वत सहयोगी हैं। सभी आध्यात्मिक ग्रहों के ऊपर भगवान कृष्ण का निवास कृष्ण लोक या गोलोक वृंदावन कहलाता है, और पूर्ण जीवित प्राणी, उपरोक्त विशेषताओं के अठारह प्रतिशत को पूर्णता में विकसित करके, वर्तमान भौतिक शरीर को छोड़ने के बाद कृष्ण लोक के ग्रह में प्रवेश कर सकते हैं।
