श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.3.24 
तत: कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।
बुद्धो नाम्नाञ्जनसुत: कीकटेषु भविष्यति ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात कलियुग के आरंभ में गये प्रान्त में श्रद्धालु आस्तिकों से ईर्ष्या करने वालों को मोहित करने के लिए भगवान् अनजना के पुत्र बुद्ध के रूप में प्रकट होंगे।
 
Then, at the beginning of Kali-yuga, the Lord will appear in the form of Buddha, the son of Anjana, in the Gaya region to charm those who are jealous of the devout believers.
तात्पर्य
भगवान बुद्ध, भगवद् व्यक्तित्व का एक शक्तिशाली अवतार, गया (बिहार) प्रांत में अंजना के पुत्र के रूप में प्रकट हुए, उन्होंने अहिंसा की अपनी संकल्पना का उपदेश दिया और वेदों में स्वीकृत पशु बलि का भी विरोध किया। जिस समय भगवान बुद्ध प्रकट हुए, उस समय के लोग सामान्य रूप से नास्तिक थे और किसी भी अन्य चीज़ से अधिक पशु मांस को प्राथमिकता देते थे। वैदिक बलि की आड़ में, लगभग हर जगह वधशाला में बदल गई, और असीमित रूप से पशुओं की हत्या की जा रही थी। भगवान बुद्ध ने गरीब जानवरों पर दया करते हुए अहिंसा का उपदेश दिया। उन्होंने उपदेश दिया कि वे वेदों के सिद्धांतों में विश्वास नहीं करते हैं और पशु-हत्या से उत्पन्न होने वाले प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर जोर दिया। कलियुग के कम बुद्धिमान लोग, जिनकी ईश्वर में कोई आस्था नहीं थी, उनके सिद्धांत का पालन करते थे, और कुछ समय के लिए उन्हें नैतिक अनुशासन और अहिंसा में प्रशिक्षित किया जाता था, जो ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रारंभिक कदम है। उन्होंने नास्तिकों को मोहित किया क्योंकि ऐसे नास्तिक जो उनके सिद्धांतों का पालन करते थे, वे भगवान में विश्वास नहीं करते थे, लेकिन वे भगवान बुद्ध में अपनी पूर्ण आस्था रखते थे, जो स्वयं भगवान के अवतार थे। इस प्रकार अविश्वासी लोगों को भगवान बुद्ध के रूप में ईश्वर में विश्वास दिलाया गया। वह भगवान बुद्ध की दया थी: उन्होंने अविश्वासी को अपने प्रति न्यस्तावान बनाया। भगवान बुद्ध के आगमन से पहले जानवरों की हत्या समाज की सबसे प्रमुख विशेषता थी। लोगों ने दावा किया कि ये वैदिक बलिदान थे। जब वेदों को आधिकारिक शिष्य उत्तराधिकार के माध्यम से स्वीकार नहीं किया जाता है, तो वेदों के आकस्मिक पाठक उस ज्ञान प्रणाली की फूलों वाली भाषा से गुमराह हो जाते हैं। भगवद्-गीता में ऐसे मूर्ख विद्वानों (अविपश्चितः) पर एक टिप्पणी की गई है। वैदिक साहित्य के मूढ़ विद्वान जो शिष्य उत्तराधिकार के दिव्य साक्षात्कारित स्रोतों के माध्यम से दिव्य संदेश प्राप्त करने की परवाह नहीं करते हैं, वे निश्चित रूप से चकरा जाएंगे। उनके लिए, अनुष्ठानिक समारोहों को सर्वोपरि माना जाता है। उनके पास ज्ञान की कोई गहराई नहीं है। भगवद्-गीता (15.15) के अनुसार, वेदई च सर्वैर अहम् एव वेद्यः : वेदों की पूरी प्रणाली किसी व्यक्ति को धीरे-धीरे भगवान के मार्ग पर ले जाती है। वैदिक साहित्य का पूरा विषय भगवान, व्यक्तिगत आत्मा, ब्रह्मांडीय स्थिति और इन सभी मदों के बीच के संबंध को जानना है। जब संबंध ज्ञात हो जाता है, तो सापेक्ष कार्य शुरू होता है, और इस तरह के कार्य के परिणामस्वरूप जीवन का अंतिम लक्ष्य या ईश्वर के पास वापस जाना सबसे आसान तरीके से होता है। दुर्भाग्य से, वेदों के अनधिकृत विद्वान केवल शुद्धिकरण समारोहों से ही मोहित हो जाते हैं, और इस प्रकार स्वाभाविक प्रगति की जाँच की जाती है। नास्तिक प्रवृत्ति के ऐसे चकित व्यक्ति के लिए, भगवान बुद्ध आस्तिकता के प्रतीक हैं। इसलिए उन्होंने सबसे पहले पशुओं को मारने की आदत को रोकना चाहा। ईश्वर के पास वापस जाने वाले मार्ग पर पशु-हत्यारे खतरनाक तत्व हैं। पशु-हत्यारे दो प्रकार के होते हैं। आत्मा को कभी-कभी "पशु" या जीवित प्राणी भी कहा जाता है। इसलिए, दोनों पशुओं के कसाई और जिन्होंने अपनी आत्मा की पहचान खो दी है, वे पशु-हत्यारे हैं।

महाराज परीक्षित ने कहा कि केवल पशु हत्यारा ही भगवान के परावाणी संदेश का पालन नहीं कर सकता है। अतः यदि लोगों को भगवती के मार्ग की शिक्षा दी जानी है, तो उन्हें सबसे पहले ऊपर बताए अनुसार पशु-वध की प्रक्रिया को रोकना सिखाया जाना चाहिए। यह कहना निरर्थक है कि पशु-हत्या का आध्यात्मिक बोध से कोई लेना-देना नहीं है। इस खतरनाक सिद्धांत के द्वारा काली-युग की कृपा से अनेक तथाकथित संन्यासियों ने सृजन किया है जो वेदों के आवरण में पशु-हत्या का प्रचार करते हैं। इस विषय पर भगवान चैतन्य और मौलाना चाँद काजी शाहेब के बीच बातचीत में पहले ही चर्चा हो चुकी है। वेदों में बताए गए पशु बलि से अलग है पशुओं को वध करने वाले घरों में वध करना। क्योंकि असुरों या वैदिक साहित्य के तथाकथित विद्वानों ने वेदों में पशु-हत्या के प्रमाण दिए, इसलिए भगवान बुद्ध ने सतही तौर पर वेदों के अधिकार को नकार दिया। भगवान बुद्ध द्वारा वेदों की अस्वीकृति को लोगों को पशु-हत्या के दोष से बचाने के साथ-साथ गरीब जानवरों को उनके बड़े भाइयों के वध करने की प्रक्रिया से बचाने के लिए अपनाया गया था जो सार्वभौमिक भाईचारे, शांति, न्याय और निष्पक्षता का घमंड करते हैं। पशु-हत्या होने पर कोई न्याय नहीं होता। भगवान बुद्ध इसे पूरी तरह से रोकना चाहते थे, और इसलिए उनकी अहिंसा का प्रचार न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी किया गया। तकनीकी रूप से भगवान बुद्ध के दर्शन को नास्तिक कहा जाता है क्योंकि वहां सर्वोच्च भगवान की कोई स्वीकृति नहीं है और क्योंकि उस दर्शन प्रणाली ने वेदों के अधिकार को नकार दिया है। लेकिन यह भगवान द्वारा छद्म रूप धारण करने का कार्य है। भगवान बुद्ध भगवत्व का अवतार हैं। जैसे, वे वैदिक ज्ञान के मूल प्रतिपादक हैं। इसलिए वे वैदिक दर्शन को अस्वीकार नहीं कर सकते। लेकिन उन्होंने बाह्य रूप से इसे अस्वीकार कर दिया क्योंकि सुर-द्वेष, या राक्षस जो हमेशा भगवान के भक्तों से ईर्ष्या करते हैं, वेदों के पृष्ठों से गो-हत्या या पशु-हत्या का समर्थन करने का प्रयास करते हैं, और अब यह आधुनिक संन्यासियों द्वारा किया जा रहा है। भगवान बुद्ध को वेदों के अधिकार को पूरी तरह से अस्वीकार करना पड़ा। यह मात्र तकनीकी है, और यदि ऐसा नहीं होता तो उन्हें भगवत्व के अवतार के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता। और न ही वैष्णव आचार्य होने वाले कवि जयदेव के दिव्य गीतों में उनकी पूजा की जाती। भगवान बुद्ध ने वेदों के मूलभूत सिद्धांतों का उपदेश एक ऐसे तरीके से दिया जो उस समय के लिए उपयुक्त था (और शंकराचार्य ने भी ऐसा ही किया) वेदों के अधिकार को स्थापित करने के लिए। इसलिए भगवान बुद्ध और आचार्य शंकर दोनों ने ही ईश्वरवाद का मार्ग प्रशस्त किया, और वैष्णव आचार्य, विशेष रूप से भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु, लोगों को भगवती की ओर लौटने की भावना के मार्ग पर ले गए। हमें खुशी है कि लोग भगवान बुद्ध के अहिंसक आंदोलन में रुचि ले रहे हैं। लेकिन क्या वे इस मामले को बहुत गंभीरता से लेंगे और पशु वध गृहों को पूरी तरह से बंद कर देंगे? यदि नहीं, तो अहिंसा पंथ का कोई अर्थ नहीं है। श्रीमद-भागवतम् की रचना कलियुग के प्रारंभ से ठीक पहले (लगभग पाँच हज़ार साल पहले) हुई थी, और भगवान बुद्ध लगभग छब्बीस सौ साल पहले प्रकट हुए थे। इसलिए श्रीमद-भागवतम् में भगवान बुद्ध की भविष्यवाणी की गई है। इस तरह इस स्पष्ट धर्मग्रंथ का अधिकार है। ऐसी कई भविष्यवाणियाँ हैं, और वे एक के बाद एक पूरी की जा रही हैं। वे श्रीमद-भागवतम् की सकारात्मक स्थिति का संकेत देंगे, जिसमें भूल, भ्रम, धोखा और अपूर्णता का कोई निशान नहीं है, जो कि सभी बद्ध आत्माओं की चार खामियाँ हैं। मुक्त आत्माएँ इन खामियों से ऊपर हैं; इसलिए वे उन चीजों को देख और बता सकते हैं जो दूर भविष्य की तारीखों में घटित होने वाली हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)