महाराज परीक्षित ने कहा कि केवल पशु हत्यारा ही भगवान के परावाणी संदेश का पालन नहीं कर सकता है। अतः यदि लोगों को भगवती के मार्ग की शिक्षा दी जानी है, तो उन्हें सबसे पहले ऊपर बताए अनुसार पशु-वध की प्रक्रिया को रोकना सिखाया जाना चाहिए। यह कहना निरर्थक है कि पशु-हत्या का आध्यात्मिक बोध से कोई लेना-देना नहीं है। इस खतरनाक सिद्धांत के द्वारा काली-युग की कृपा से अनेक तथाकथित संन्यासियों ने सृजन किया है जो वेदों के आवरण में पशु-हत्या का प्रचार करते हैं। इस विषय पर भगवान चैतन्य और मौलाना चाँद काजी शाहेब के बीच बातचीत में पहले ही चर्चा हो चुकी है। वेदों में बताए गए पशु बलि से अलग है पशुओं को वध करने वाले घरों में वध करना। क्योंकि असुरों या वैदिक साहित्य के तथाकथित विद्वानों ने वेदों में पशु-हत्या के प्रमाण दिए, इसलिए भगवान बुद्ध ने सतही तौर पर वेदों के अधिकार को नकार दिया। भगवान बुद्ध द्वारा वेदों की अस्वीकृति को लोगों को पशु-हत्या के दोष से बचाने के साथ-साथ गरीब जानवरों को उनके बड़े भाइयों के वध करने की प्रक्रिया से बचाने के लिए अपनाया गया था जो सार्वभौमिक भाईचारे, शांति, न्याय और निष्पक्षता का घमंड करते हैं। पशु-हत्या होने पर कोई न्याय नहीं होता। भगवान बुद्ध इसे पूरी तरह से रोकना चाहते थे, और इसलिए उनकी अहिंसा का प्रचार न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी किया गया। तकनीकी रूप से भगवान बुद्ध के दर्शन को नास्तिक कहा जाता है क्योंकि वहां सर्वोच्च भगवान की कोई स्वीकृति नहीं है और क्योंकि उस दर्शन प्रणाली ने वेदों के अधिकार को नकार दिया है। लेकिन यह भगवान द्वारा छद्म रूप धारण करने का कार्य है। भगवान बुद्ध भगवत्व का अवतार हैं। जैसे, वे वैदिक ज्ञान के मूल प्रतिपादक हैं। इसलिए वे वैदिक दर्शन को अस्वीकार नहीं कर सकते। लेकिन उन्होंने बाह्य रूप से इसे अस्वीकार कर दिया क्योंकि सुर-द्वेष, या राक्षस जो हमेशा भगवान के भक्तों से ईर्ष्या करते हैं, वेदों के पृष्ठों से गो-हत्या या पशु-हत्या का समर्थन करने का प्रयास करते हैं, और अब यह आधुनिक संन्यासियों द्वारा किया जा रहा है। भगवान बुद्ध को वेदों के अधिकार को पूरी तरह से अस्वीकार करना पड़ा। यह मात्र तकनीकी है, और यदि ऐसा नहीं होता तो उन्हें भगवत्व के अवतार के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता। और न ही वैष्णव आचार्य होने वाले कवि जयदेव के दिव्य गीतों में उनकी पूजा की जाती। भगवान बुद्ध ने वेदों के मूलभूत सिद्धांतों का उपदेश एक ऐसे तरीके से दिया जो उस समय के लिए उपयुक्त था (और शंकराचार्य ने भी ऐसा ही किया) वेदों के अधिकार को स्थापित करने के लिए। इसलिए भगवान बुद्ध और आचार्य शंकर दोनों ने ही ईश्वरवाद का मार्ग प्रशस्त किया, और वैष्णव आचार्य, विशेष रूप से भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु, लोगों को भगवती की ओर लौटने की भावना के मार्ग पर ले गए। हमें खुशी है कि लोग भगवान बुद्ध के अहिंसक आंदोलन में रुचि ले रहे हैं। लेकिन क्या वे इस मामले को बहुत गंभीरता से लेंगे और पशु वध गृहों को पूरी तरह से बंद कर देंगे? यदि नहीं, तो अहिंसा पंथ का कोई अर्थ नहीं है। श्रीमद-भागवतम् की रचना कलियुग के प्रारंभ से ठीक पहले (लगभग पाँच हज़ार साल पहले) हुई थी, और भगवान बुद्ध लगभग छब्बीस सौ साल पहले प्रकट हुए थे। इसलिए श्रीमद-भागवतम् में भगवान बुद्ध की भविष्यवाणी की गई है। इस तरह इस स्पष्ट धर्मग्रंथ का अधिकार है। ऐसी कई भविष्यवाणियाँ हैं, और वे एक के बाद एक पूरी की जा रही हैं। वे श्रीमद-भागवतम् की सकारात्मक स्थिति का संकेत देंगे, जिसमें भूल, भ्रम, धोखा और अपूर्णता का कोई निशान नहीं है, जो कि सभी बद्ध आत्माओं की चार खामियाँ हैं। मुक्त आत्माएँ इन खामियों से ऊपर हैं; इसलिए वे उन चीजों को देख और बता सकते हैं जो दूर भविष्य की तारीखों में घटित होने वाली हैं।
