नरदेवत्वमापन्न: सुरकार्यचिकीर्षया ।
समुद्रनिग्रहादीनि चक्रे वीर्याण्यत: परम् ॥ २२ ॥
अनुवाद
अठारहवें अवतार के रूप में, भगवान ने राजा राम का रूप लिया। उन्होंने देवताओं को प्रसन्न करने के उद्देश्य से हिन्द महासागर को नियंत्रित करते हुए समुद्र के उस पार रहने वाले नास्तिक राजा रावण का वध किया और अपनी अलौकिक शक्ति का प्रदर्शन किया।
In the eighteenth incarnation, the Lord appeared as King Rama. He demonstrated his superhuman power by subduing the Indian Ocean and killing the atheist King Ravana who lived across the ocean in order to do something pleasing to the gods.
तात्पर्य
ईश्वर की व्यक्तित्व श्री राम ने एक मनुष्य का रुप धारण किया और ब्रह्मांड के नियम को बनाए रखने के लिए देवताओं या प्रशासनिक व्यक्तित्वों के लिए कुछ मनभावन कार्य करने के उद्देश्य से पृथ्वी पर अवतरित हुए। कभी-कभी रावण और हिरण्यकश्यप जैसे महान राक्षस और नास्तिक और कई अन्य लोग भौतिक विज्ञान और अन्य गतिविधियों की सहायता से भौतिक सभ्यता को आगे बढ़ाकर बहुत प्रसिद्ध हो जाते हैं। भगवान के स्थापित नियम को चुनौती देने की भावना रखते हैं। उदाहरण के लिए, भौतिक साधनों द्वारा अन्य ग्रहों पर जाने का प्रयास स्थापित व्यवस्था के लिए एक चुनौती है। प्रत्येक ग्रह की स्थितियाँ भिन्न होती हैं, और भगवान के नियमों में उल्लिखित विशिष्ट उद्देश्यों के लिए विभिन्न वर्गों के मनुष्य वहाँ रहते हैं। लेकिन, भौतिक उन्नति में छोटी सी सफलता से घमंड में आकर, कभी-कभी ईश्वरविहीन भौतिकवादी ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देते हैं। रावण उनमें से एक था, और वह भौतिक साधनों द्वारा सामान्य मनुष्यों को इंद्र के ग्रह (स्वर्ग) में भेजना चाहता था, बिना आवश्यक योग्यताओं पर विचार किए। वह सीधे स्वर्गीय ग्रह तक पहुँचने के लिए एक सीढ़ी बनाना चाहता था ताकि लोगों को उस ग्रह में प्रवेश करने के लिए आवश्यक पवित्र कार्य की दिनचर्या से गुजरने की आवश्यकता न हो। वह भगवान के स्थापित नियम के खिलाफ अन्य कार्य भी करना चाहता था। उसने भगवान श्री राम के व्यक्तित्व पर भी सवाल उठाया और उनकी पत्नी सीता का अपहरण कर लिया। बेशक, भगवान राम इस नास्तिक को दंड देने के लिए आए, और देवताओं की प्रार्थना का उत्तर दिया और उनकी इच्छा पूरी की। इसलिए उन्होंने रावण की चुनौती स्वीकार कर ली, और पूरी घटना रामायण का विषय है। क्योंकि भगवान रामचंद्र भगवान के व्यक्तित्व थे, उन्होंने अलौकिक क्रियाएँ दिखाईं जो कोई भी मनुष्य, जिसमें भौतिक रूप से उन्नत रावण भी शामिल था, नहीं कर सकता था। भगवान रामचंद्र ने हिंद महासागर पर पानी पर तैरते पत्थरों से एक राजमार्ग तैयार किया। आधुनिक वैज्ञानिकों ने भारहीनता के क्षेत्र में शोध किया है, लेकिन कहीं भी और हर जगह भारहीनता नहीं लाई जा सकती। लेकिन क्योंकि भारहीनता भगवान की रचना है जिसके द्वारा वह विशाल ग्रहों को हवा में उड़ा और तैर सकता है, उन्होंने पृथ्वी के भीतर के पत्थरों को भारहीन बना दिया और बिना किसी सहायक स्तंभ के समुद्र पर एक पत्थर का पुल तैयार किया। यही ईश्वर की शक्ति का प्रदर्शन है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥