श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.3.14 
ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपु: ।
दुग्धेमामोषधीर्विप्रास्तेनायं स उशत्तम: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणों, जब मुनियों ने प्रार्थना की, तब भगवान ने नौवें अवतार में राजा (पृथु) का शरीर धारण किया। राजा पृथु ने पृथ्वी पर खेती की और विविध उपजें प्राप्त कीं। इससे पृथ्वी सुंदर और आकर्षक हो गई।
 
O Brahmins, on being prayed to by the sages, the Lord in the ninth incarnation assumed the form of a king (Prithu) who tilled the earth to obtain various crops. As a result the earth became very beautiful and attractive.
तात्पर्य
राजा पृथु के आगमन से पहले, पिछले राजा, महाराजा पृथु के पिता के बुरे जीवन के कारण कुप्रबंधन का भारी प्रकोप था। बुद्धिजीवी वर्ग (जैसे कि ऋषि और ब्राह्मण) ने न केवल भगवान से नीचे आने के लिए प्रार्थना की, बल्कि पिछले राजा को भी अपदस्थ कर दिया। राजा का कर्तव्य है कि वह धार्मिक हो और इस प्रकार समस्त नागरिकों के कल्याण की देखभाल करे। जब भी राजा अपने कर्तव्य के निर्वहन में कोई लापरवाही करता है, बुद्धिमान वर्ग को उसे अपदस्थ करना चाहिए। हालाँकि, बुद्धिमान वर्ग शाही सिंहासन पर नहीं बैठता, क्योंकि उनके पास जन कल्याण के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण कर्तव्य है। शाही सिंहासन पर बैठने के बजाय, उन्होंने भगवान के अवतार के लिए प्रार्थना की, और भगवान महाराजा पृथु के रूप में आए। वास्तविक बुद्धिमान पुरुष, या योग्य ब्राह्मण, कभी भी राजनीतिक पदों की आकांक्षा नहीं करते हैं। महाराजा पृथु ने पृथ्वी से कई उपजों का उत्खनन किया, और इस प्रकार न केवल नागरिकों को ऐसा अच्छा राजा मिलने से खुशी हुई, बल्कि पृथ्वी का पूरा दृश्य भी सुंदर और आकर्षक बन गया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)