श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 3: समस्त अवतारों के स्रोत : कृष्ण  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.3.13 
अष्टमे मेरुदेव्यां तु नाभेर्जात उरुक्रम: ।
दर्शयन् वर्त्म धीराणां सर्वाश्रमनमस्कृतम् ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
आठवें अवतार राजा ऋषभ के रूप में हुए। राजा नाभि और उनकी पत्नी मेरुदेवी के पुत्र थे राजा ऋषभ। इस अवतार में भगवान ने पूर्णता का मार्ग दिखलाया जिसका अनुसरण उन लोगों द्वारा किया जाता है जिन्होंने अपनी इंद्रियों को पूरी तरह से संयमित कर लिया है और जो सभी वर्णाश्रम के लोगों द्वारा पूजनीय हैं।
 
The eighth incarnation was that of King Rishabha. He was the son of King Nabhi and his wife Merudevi. In this incarnation the Lord showed the path of perfection which is followed by those who have completely controlled their senses and who are worshiped by people of all varnashramas.
तात्पर्य
मानव समाज स्वाभाविक रूप से आठ श्रेणियों और जीवन के पदों में विभाजित है - व्यवसाय के चार विभाग और सांस्कृतिक उन्नति के चार विभाग। बुद्धिमान वर्ग, प्रशासनिक वर्ग, उत्पादक वर्ग और श्रमिक वर्ग व्यवसाय के चार विभाग हैं। और छात्र जीवन, गृहस्थ जीवन, सेवानिवृत्ति जीवन और त्याग जीवन आध्यात्मिक उपलब्धि के पथ की ओर सांस्कृतिक उन्नति की चार स्थितियाँ हैं। इनमें से, त्यागी जीवन क्रम, या सन्यास क्रम, सभी में सबसे ऊंचा माना जाता है, और एक संन्यासी संवैधानिक रूप से सभी आदेशों और प्रभागों के लिए आध्यात्मिक गुरु होता है। संन्यास क्रम में पूर्णता की ओर उत्थान की चार अवस्थाएँ भी हैं। इन अवस्थाओं को कुटीचक, बहुदक, परिव्राजकाचार्य और परमहंस कहा जाता है। जीवन की परमहंस अवस्था पूर्णता की सर्वोच्च अवस्था है। जीवन के इस क्रम का सभी अन्य सम्मान करते हैं। राजा नाभि और मेरुदेवी के पुत्र महाराज ऋषभ, भगवान के अवतार थे, और उन्होंने अपने पुत्रों को तपस्या के माध्यम से पूर्णता के मार्ग का पालन करने का निर्देश दिया, जो किसी के अस्तित्व को पवित्र करता है और व्यक्ति को आध्यात्मिक खुशी की अवस्था को प्राप्त करने में सक्षम बनाता है जो शाश्वत है और लगातार बढ़ रहा है। प्रत्येक जीवित प्राणी सुख की तलाश में है, लेकिन कोई नहीं जानता कि शाश्वत और असीमित सुख कहाँ से प्राप्त किया जा सकता है। मूर्ख व्यक्ति वास्तविक सुख के विकल्प के रूप में भौतिक इंद्रिय सुख की तलाश करते हैं, लेकिन ऐसे मूर्ख यह भूल जाते हैं कि इंद्रियों के सुख से प्राप्त अस्थायी तथाकथित सुख का आनंद कुत्ते और सूअर भी लेते हैं। कोई भी जानवर, पक्षी या जानवर इस इंद्रिय सुख से वंचित नहीं है। जीवन की प्रत्येक प्रजाति में, मानव जीवन के रूप सहित, ऐसा सुख अत्यधिक उपलब्ध है। हालाँकि, मानव जीवन इस तरह के सस्ते सुख के लिए नहीं है। मानव जीवन आध्यात्मिक प्राप्ति द्वारा शाश्वत और असीमित सुख प्राप्त करने के लिए है। यह आध्यात्मिक साक्षात्कार तपस्या द्वारा प्राप्त किया जाता है, या तपस्या के मार्ग को स्वेच्छा से अपनाना और भौतिक सुख से परहेज करना। जिन्हें भौतिक सुखों में संयम के लिए प्रशिक्षित किया गया है, उन्हें धीर या इंद्रियों से अविचलित पुरुष कहा जाता है। केवल ये धीर ही संन्यास के आदेशों को स्वीकार कर सकते हैं, और वे धीरे-धीरे परमहंस की स्थिति तक पहुँच सकते हैं, जिसकी समाज के सभी सदस्य पूजा करते हैं। राजा ऋषभ ने इस मिशन का प्रचार किया, और अंतिम चरण में वह भौतिक शारीरिक ज़रूरतों से पूरी तरह से अलग हो गए, जो एक दुर्लभ अवस्था है जिसकी नकल मूर्खों द्वारा नहीं की जानी चाहिए, बल्कि सभी द्वारा पूजा की जानी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)