धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्पते ।
नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृत: ॥ ९ ॥
अनुवाद
सभी व्यावसायिक गतिविधियाँ निश्चित रूप से परम मोक्ष के लिए होती हैं। उन्हें केवल भौतिक लाभ के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा, ऋषियों के अनुसार, जो परम व्यावसायिक सेवा में लगे हुए हैं, उन्हें भौतिक लाभ का उपयोग इंद्रियतृप्ति के संवर्धन के लिए नहीं करना चाहिए।
All vocational activities are certainly for the sake of ultimate liberation. They should never be performed for material gain. Further, according to the sages, those who are engaged in the ultimate vocation (dharma) should never use material gain for the promotion of sense gratification.
तात्पर्य
हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि प्रभु की शुद्ध भक्ति-भावना के साथ परिपूर्ण ज्ञान और भौतिक अस्तित्व से अनासक्ति अपने आप आ जाती है। परंतु कुछ अन्य लोग यह मानते हैं कि सभी तरह के व्यवसायिक अन्वेषण, जिसमें धर्म भी शामिल है, भौतिक लाभ के लिए हैं। संसार के किसी भी हिस्से में किसी भी साधारण व्यक्ति की सामान्य प्रवृत्ति होती है कि किसी धार्मिक या किसी अन्य व्यावसायिक सेवा के बदले में भौतिक लाभ हासिल किया जाए। यहाँ तक कि वैदिक साहित्य में भी सभी तरह के धार्मिक प्रदर्शनों के लिए भौतिक लाभ का प्रलोभन दिया जाता है और अधिकांश लोग धार्मिकता के ऐसे प्रलोभनों या आशीर्वाद से आकर्षित होते हैं। ऐसे तथाकथित धर्म के लोग भौतिक लाभ से क्यों आकर्षित होते हैं? क्योंकि भौतिक लाभ किसी को भी इच्छाओं को पूरा करने के योग्य बनाता है, जो बदले में इंद्रिय-तृप्ति को संतुष्ट करता है। व्यवसायिक सहभागिता के इस चक्र में तथाकथित धार्मिकता शामिल है जिसके बाद भौतिक लाभ होता है और भौतिक लाभ जिसके बाद इच्छाओं की पूर्ति होती है। इंद्रिय-सुख सभी प्रकार के पूर्ण रूप से व्यस्त लोगों के लिए सामान्य तरीका है। परंतु श्रीमद-भागवतम् के फैसले के अनुसार, सूत गोस्वामी के कथन में, इसे वर्तमान श्लोक द्वारा रद्द कर दिया गया है। किसी को भी केवल भौतिक लाभ के लिए किसी भी तरह की व्यावसायिक सेवा में शामिल नहीं होना चाहिए। न ही भौतिक लाभ का उपयोग इंद्रिय-तृप्ति के लिए किया जाना चाहिए। भौतिक लाभ का उपयोग कैसे किया जाना चाहिए, इसका वर्णन इस प्रकार है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥