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श्लोक 1.2.6  |
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति ॥ ६ ॥ |
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| अनुवाद |
| सम्पूर्ण मानवता के लिए श्रेष्ठ कर्तव्य (धर्म) वही है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर की प्रेममयी भक्ति प्राप्त कर सके। ऐसी भक्ति निस्वार्थ और निरंतर होनी चाहिए जिससे आत्मा पूर्णतया संतुष्ट हो सके। |
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| सम्पूर्ण मानवता के लिए श्रेष्ठ कर्तव्य (धर्म) वही है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर की प्रेममयी भक्ति प्राप्त कर सके। ऐसी भक्ति निस्वार्थ और निरंतर होनी चाहिए जिससे आत्मा पूर्णतया संतुष्ट हो सके। |
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