स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति ॥ ६ ॥
अनुवाद
सम्पूर्ण मानवता के लिए श्रेष्ठ कर्तव्य (धर्म) वही है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर की प्रेममयी भक्ति प्राप्त कर सके। ऐसी भक्ति निस्वार्थ और निरंतर होनी चाहिए जिससे आत्मा पूर्णतया संतुष्ट हो सके।
The ultimate attitude (dharma) for the whole of humanity is that by which all human beings can attain loving devotion to the divine God. Such devotion should be without reason and continuous so that the soul can be completely satisfied.
तात्पर्य
इस कथन में, श्री सूत गोस्वामी ने नैमिषारण्य के ऋषियों के पहले प्रश्न का उत्तर दिया है। ऋषियों ने उनसे प्रकट शास्त्रों की संपूर्ण श्रृंखला का सारांश देने और सबसे आवश्यक भाग प्रस्तुत करने के लिए कहा ताकि पतित लोग या सामान्य लोग इसे आसानी से अपना सकें। वेद मानव के लिए दो अलग-अलग प्रकार के व्यवसाय निर्धारित करते हैं। एक को प्रवृत्ति-मार्ग या इंद्रिय भोग का मार्ग कहा जाता है, और दूसरे को निवृत्ति-मार्ग या त्याग का मार्ग कहा जाता है। भोग का मार्ग निम्नतर है और परम कारण के लिए त्याग का मार्ग श्रेष्ठ है। जीव का भौतिक अस्तित्व वास्तविक जीवन की एक रोगग्रस्त स्थिति है। वास्तविक जीवन आध्यात्मिक अस्तित्व है, या ब्रह्म-भूत अस्तित्व है, जहां जीवन शाश्वत, आनंदमय और ज्ञान से भरा होता है। भौतिक अस्तित्व अस्थायी, भ्रामक और दुखों से भरा हुआ होता है। इसमें बिल्कुल भी सुख नहीं है। दुखों से छुटकारा पाने का व्यर्थ प्रयास है, और दुख की अस्थायी समाप्ति को गलती से सुख कहा जाता है। इसलिए, प्रगतिशील भौतिक भोग का मार्ग, जो अस्थायी, दयनीय और भ्रामक है, निम्नतर है। लेकिन परम भगवान की भक्ति सेवा, जो व्यक्ति को शाश्वत, आनंदमय और सर्वज्ञ जीवन की ओर ले जाती है, श्रेष्ठ गुण वाला व्यवसाय कहलाती है। कभी-कभी निम्न गुणवत्ता के साथ मिश्रित होने पर यह प्रदूषित हो जाता है। उदाहरण के लिए, भौतिक लाभ के लिए भक्ति सेवा को अपनाना निश्चित रूप से त्याग के प्रगतिशील मार्ग में बाधा है। जीवन की रोगग्रस्त स्थिति में सुख भोग की तुलना में परम कल्याण के लिए त्याग या त्याग निश्चित रूप से बेहतर व्यवसाय है। ऐसा आनंद केवल रोग के लक्षणों को बढ़ाता है और उसकी अवधि बढ़ाता है। इसलिए भगवान में भक्ति सेवा गुणवत्ता में शुद्ध होनी चाहिए, अर्थात् भौतिक भोग की जरा सी भी इच्छा के बिना। इसलिए, व्यक्ति को बिना किसी अनावश्यक इच्छा, सकाम कर्म और दार्शनिक अटकलों के भगवान की भक्ति सेवा के रूप में श्रेष्ठ गुणवत्ता वाले व्यवसाय को स्वीकार करना चाहिए। अकेले यही व्यक्ति को उनकी सेवा में सतत आनंद की ओर ले जा सकता है। हमने जानबूझकर धर्म को व्यवसाय के रूप में निरूपित किया है क्योंकि धर्म शब्द के मूल अर्थ "वह है जो किसी के अस्तित्व को बनाए रखता है"। एक जीव का अस्तित्व परम भगवान कृष्ण के साथ अपने शाश्वत संबंध के साथ अपनी गतिविधियों का समन्वय करना है। कृष्ण जीवों का केंद्रीय धुरी हैं, और वे सभी जीवों या शाश्वत रूपों के बीच सर्व-आकर्षक जीवित इकाई या शाश्वत रूप हैं। प्रत्येक जीव का आध्यात्मिक अस्तित्व में अपना शाश्वत रूप होता है, और कृष्ण उन सभी के लिए शाश्वत आकर्षण हैं। कृष्ण पूर्ण संपूर्ण हैं, और बाकी सब कुछ उनके अंश और पार्सल हैं। संबंध सेवक और सेवित में से एक है। यह पारलौकिक है और भौतिक अस्तित्व में हमारे अनुभव से पूरी तरह से अलग है। सेवक और सेवित का यह संबंध अंतरंगता का सबसे अनुकूल रूप है। भक्ति सेवा की प्रगति के रूप में इसे महसूस किया जा सकता है। भौतिक अस्तित्व की वर्तमान सशर्त अवस्था में भी, हर किसी को भगवान की उस पारलौकिक प्रेममय सेवा में संलग्न होना चाहिए। वह धीरे-धीरे व्यक्ति को वास्तविक जीवन का सुराग देगा और उसे पूर्ण संतुष्टि के लिए प्रसन्न करेगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥