यथा ह्यवहितो वह्निर्दारुष्वेक: स्वयोनिषु ।
नानेव भाति विश्वात्मा भूतेषु च तथा पुमान् ॥ ३२ ॥
अनुवाद
प्रभु परमात्मा, परम आत्मा के रूप में, सभी वस्तुओं में उसी तरह व्याप्त हैं जिस तरह से आग लकड़ी में व्याप्त रहती है। हालांकि वह एकमात्र और सर्वोच्च हैं, वह कई रूपों में दिखाई देते हैं।
The Lord as the Supersoul pervades all things just as fire pervades wood, and thus, although He is one and unique, He appears in many forms.
तात्पर्य
भगवान वासुदेव, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व, अपने एक पूर्ण भाग द्वारा पूरे भौतिक जगत में स्वयं को विस्तारित करते हैं, और उनके अस्तित्व को परमाणु ऊर्जा के भीतर भी देखा जा सकता है। पदार्थ, प्रतिपदार्थ, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, आदि सभी प्रभु के परमात्मा रूप के विभिन्न प्रभाव हैं। जैसे लकड़ी से आग प्रकट की जा सकती है, या जैसे दूध से मक्खन निकाला जा सकता है, वैसे ही परमात्मा के रूप में प्रभु की उपस्थिति वैदिक साहित्यों विशेष रूप से उपनिषद और वेदांत में बताए गए दिव्य विषयों को सुनने और जपने की वैध प्रक्रिया से महसूस की जा सकती है। श्रीमद-भागवतम् इन वैदिक साहित्यों की प्रामाणिक व्याख्या है। प्रभु को दिव्य संदेश के श्रवण ग्रहण के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है, और दिव्य विषय का अनुभव करने का यही एकमात्र तरीका है। जैसे किसी अन्य आग से लकड़ी से आग प्रज्वलित की जाती है, उसी तरह एक अन्य दिव्य कृपा द्वारा मनुष्य की दिव्य चेतना को भी प्रज्वलित किया जा सकता है। उनकी दिव्य कृपा आध्यात्मिक गुरु ग्रहणशील कान में डाले जाने वाले उचित आध्यात्मिक संदेशों को प्रदान करके लकड़ी जैसी जीवित संस्था से आध्यात्मिक अग्नि को प्रज्वलित कर सकते हैं। इसलिए केवल ग्रहणशील कानों वाले उचित आध्यात्मिक गुरु के पास जाने की आवश्यकता है, और इस प्रकार धीरे-धीरे दिव्य अस्तित्व का एहसास होता है। पशुता और मानवता के बीच का अंतर केवल इसी प्रक्रिया में निहित है। एक मनुष्य ठीक से सुन सकता है, जबकि एक जानवर नहीं सुन सकता।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥