श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.2.3 
य: स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-
मध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम् ।
संसारिणां करुणयाह पुराणगुह्यं
तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
मैं सभी ऋषियों के गुरु, व्यासदेव के पुत्र, श्री शुकदेव जी को प्रणाम करता हूं, जिन्होंने संसार के घोर अंधकारमय भागों को पार करने के लिए संघर्ष करने वाले घोर भौतिकवादियों के प्रति करुणा दिखाते हुए, वैदिक ज्ञान के सारभूत इस परम गुह्य पुराण को स्वयं अनुभव करके सुनाया है।
 
मैं सभी ऋषियों के गुरु, व्यासदेव के पुत्र, श्री शुकदेव जी को प्रणाम करता हूं, जिन्होंने संसार के घोर अंधकारमय भागों को पार करने के लिए संघर्ष करने वाले घोर भौतिकवादियों के प्रति करुणा दिखाते हुए, वैदिक ज्ञान के सारभूत इस परम गुह्य पुराण को स्वयं अनुभव करके सुनाया है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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