श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.2.27 
रजस्तम:प्रकृतय: समशीला भजन्ति वै ।
पितृभूतप्रजेशादीन्श्रियैश्वर्यप्रजेप्सव: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
जो लोग रजोगुण और तमोगुण में होते हैं, वे उसी श्रेणी में मौजूद अपने पितरों, अन्य जीवों और सृष्टि सम्बन्धी कार्यों के प्रभारी देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि वे स्त्री, धन, शक्ति और संतान से मिलने वाले भौतिक लाभों की इच्छा से प्रेरित होते हैं।
 
Those who are in the mode of passion and ignorance worship the ancestors, other living entities and the demigods who are in charge of the activities of creation because they are motivated by the desire to take advantage of women, wealth, power and progeny.
तात्पर्य
भगवान की ओर वापस लौटने की गंभीर इच्छा वाले को किसी भी देवता की पूजा करने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। भगवद्-गीता (7.20, 23) में यह स्पष्ट कहा गया है कि जो लोग भौतिक सुख के दीवाने होते हैं, वे अस्थायी लाभों के लिए विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं, जो कि कम जानकारी वाले लोगों के लिए हैं। हमें भौतिक सुख की गहराई को बढ़ाने की इच्छा कभी नहीं रखनी चाहिए। भौतिक सुख को केवल जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए ही स्वीकार किया जाना चाहिए, न इससे ज़्यादा और न ही कम। ज़्यादा भौतिक सुख को स्वीकार करने का अर्थ है भौतिक अस्तित्व के दुखों से अपने को और ज़्यादा बांधना। ज़्यादा धन-दौलत, ज़्यादा पत्नियाँ और झूठा बड़प्पन भौतिक रूप से निपटने वाले व्यक्ति की कुछ मांगें हैं क्योंकि उन्हें विष्णु पूजा से होने वाले लाभ की जानकारी नहीं है। विष्णु पूजा द्वारा व्यक्ति इस जीवन में और साथ ही मृत्यु के बाद भी लाभ ले सकता है। इन सिद्धांतों को भूलकर, मूर्ख लोग जो ज़्यादा धन, ज़्यादा पत्नियों और ज़्यादा बच्चों के पीछे पड़े हुए हैं वे विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं। जीवन का लक्ष्य है जीवन के दुखों को ख़त्म करना, उन्हें बढ़ाना नहीं।

भौतिक सुख के लिए देवताओं से संपर्क करने की ज़रूरत नहीं है। देवता तो भगवान के सेवक मात्र हैं। जैसे कि पानी, प्रकाश, हवा आदि के रूप में जीवन की ज़रूरतें पूरी करना उनका कर्तव्य है। व्यक्ति को मेहनत से काम करना चाहिए और अस्तित्व के लिए अपने परिश्रम के फलों से परम भगवान की पूजा करनी चाहिए और यही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। व्यक्ति को ईश्वर में विश्वास के साथ उचित तरीके से व्यावसायिक सेवा करने में सावधानी रखनी चाहिए, और यही व्यक्ति को भगवान की ओर वापस जाने के प्रगतिशील मार्ग पर ले जाएगा।

भगवान श्री कृष्ण, जब वे व्यक्तिगत रूप से व्रजधाम में मौजूद थे, उन्होंने देवता इंद्र की पूजा रोक दी और व्रज के निवासियों को अपने व्यवसाय से पूजा करने और भगवान में विश्वास रखने की सलाह दी। भौतिक लाभ के लिए कई देवताओं की पूजा करना व्यावहारिक रूप से धर्म की विकृति है। धार्मिक गतिविधि के इस स्वरूप की निंदा भगवतम के प्रारंभ में ही कैतव-धर्म के रूप में की गई है। दुनिया में एक ही धर्म है जिसका सभी को पालन करना चाहिए, और वह है भागवत-धर्म, या वह धर्म जो व्यक्ति को परम व्यक्तित्व भगवान की पूजा करना सिखाता है और किसी और की नहीं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)