भौतिक सुख के लिए देवताओं से संपर्क करने की ज़रूरत नहीं है। देवता तो भगवान के सेवक मात्र हैं। जैसे कि पानी, प्रकाश, हवा आदि के रूप में जीवन की ज़रूरतें पूरी करना उनका कर्तव्य है। व्यक्ति को मेहनत से काम करना चाहिए और अस्तित्व के लिए अपने परिश्रम के फलों से परम भगवान की पूजा करनी चाहिए और यही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। व्यक्ति को ईश्वर में विश्वास के साथ उचित तरीके से व्यावसायिक सेवा करने में सावधानी रखनी चाहिए, और यही व्यक्ति को भगवान की ओर वापस जाने के प्रगतिशील मार्ग पर ले जाएगा।
भगवान श्री कृष्ण, जब वे व्यक्तिगत रूप से व्रजधाम में मौजूद थे, उन्होंने देवता इंद्र की पूजा रोक दी और व्रज के निवासियों को अपने व्यवसाय से पूजा करने और भगवान में विश्वास रखने की सलाह दी। भौतिक लाभ के लिए कई देवताओं की पूजा करना व्यावहारिक रूप से धर्म की विकृति है। धार्मिक गतिविधि के इस स्वरूप की निंदा भगवतम के प्रारंभ में ही कैतव-धर्म के रूप में की गई है। दुनिया में एक ही धर्म है जिसका सभी को पालन करना चाहिए, और वह है भागवत-धर्म, या वह धर्म जो व्यक्ति को परम व्यक्तित्व भगवान की पूजा करना सिखाता है और किसी और की नहीं।
