जो लोग मोक्ष हेतु गंभीर होते हैं, वे निश्चित ही ईर्ष्या-द्वेष से रहित रहते हैं और सभी का सम्मान करते हैं। किन्तु, इसके बावजूद वे देवताओं के भयावह और भयानक रूपों का त्याग कर केवल भगवान विष्णु के परमानंदमय रूपों और उनके पूर्णांशों की ही उपासना करते हैं।
Those who are serious about liberation are certainly without malice and respect everyone. But they still reject the fierce forms of the demigods and worship only the benevolent forms of Lord Viṣṇu and His own parts.
तात्पर्य
विष्णु-तत्वों के मूल व्यक्तित्व, परमेश्वर श्री कृष्ण, ने स्वयं को दो विभिन्न श्रेणियों में विस्तारित किया है, अर्थात् पूरे इंटीग्रेटेड हिस्से और अलग हुए हिस्से। अलग हुए ये हिस्से सेवक हैं और विष्णु-तत्व के पूरे इंटीग्रेटेड हिस्से सेवा की उपासना करने योग्य वस्तुएं हैं। सभी ऐसे देवता जो परम भगवान द्वारा सशक्त किए गए हैं, वे भी अलग किए गए हिस्से हैं। वे विष्णु-तत्व की श्रेणियों से संबंध नहीं रखते हैं। विष्णु-तत्व जीवित प्राणी हैं जो परमेश्वर के मूल रूप जितने ही शक्तिशाली हैं और वे अलग-अलग समय और परिस्थिति के हिसाब से विभिन्न श्रेणी की शक्तियों को प्रकट करते हैं। अलग किए गए हिस्से सीमित रूप से शक्तिशाली होते हैं। उनके पास विष्णु-तत्वों जैसी असीमित शक्ति नहीं होती। इसलिए, हमें कभी भी विष्णु-तत्व या परमेश्वर के पूर्ण हिस्से, नारायण को, हिस्सों के साथ एक ही श्रेणी में नहीं रखना चाहिए। जो कोई भी ऐसा करता है, वह तुरंत पाषंडी अपराधी बन जाता है। कलि युग में अनेक मूर्ख लोग ऐसे गैर-कानूनी अपराध करते हैं और इन दो श्रेणियों को बराबर रखते हैं। अलग हुए हिस्से भौतिक शक्तियों की गणना में विभिन्न स्थान रखते हैं और उनमें से कुछ काल-भैरव, श्मशान-भैरव, शनि, महाकाली और चंडिका जैसे हैं। ये देवता मुख्य रूप से उन्हीं लोगों द्वारा पूजे जाते हैं जो अंधकार या अज्ञानता के गुण के सबसे निचले स्तर पर हैं। ब्रह्मा, शिव, सूर्य, गणेश और ऐसे ही अनेक देवताओं जैसे दूसरे देवताओं की पूजा वे लोग करते हैं जो आवेश के गुण में रहते हैं और भौतिक आनंद पाने की इच्छा से प्रेरित होते हैं। लेकिन वे लोग जो वास्तव में भौतिक प्रकृति के गुण (सत्व-गुण) में हैं, वे केवल विष्णु-तत्व की पूजा करते हैं। विष्णु-तत्व को विभिन्न नामों और रूपों जैसे नारायण, दामोदर, वामन, गोविंद और अदहोक्षज से दर्शाया जाता है। योग्य ब्राह्मण विष्णु-तत्व की पूजा शालग्राम-शिला से दर्शाए गए रूप में करते हैं और कुछ ऊँची जातियों जैसे कि क्षत्रिय और वैश्य भी आम तौर पर विष्णु-तत्व की पूजा करते हैं। सत्व-गुण में स्थित अच्छे ब्राह्मण अन्य पूजा-प्रणालियों से कोई शिकायत नहीं रखते हैं। उन्हें सभी देवताओं के लिए सम्मान है, भले ही वे काल-भैरव या महाकाली की तरह भयंकर क्यों न लगते हों। वे इस बात को भली-भाँति जानते हैं कि परम भगवान की ये भयंकर विशेषताएँ विभिन्न परिस्थितियों में भगवान के विभिन्न सेवकों के अलावा कुछ भी नहीं हैं, फिर भी वह देवताओं की भयंकर और आकर्षक दोनों ही विशेषताओं की पूजा को अस्वीकार कर देते हैं और वे केवल विष्णु के रूप पर ध्यान केंद्रित करते हैं क्योंकि वे भौतिक परिस्थितियों से मुक्ति के लिए गंभीर होते हैं। देवता, यहाँ तक कि ब्रह्मा तक, जो देवताओं में सर्वोपरि हैं, भी मुक्ति किसी को नहीं दे सकते। हिरण्यकश्यप ने अनंत जीवन पाने के लिए कठोर तपस्या की, लेकिन उनके पूज्य देवता ब्रह्मा उन्हें ऐसे आशिर्वाद के लिए संतुष्ट नहीं कर सके। इसीलिए केवल विष्णु, किसी और को नहीं, को मुक्ति-पाद कहा गया है या परमेश्वर का वह रूप जो हमें मुक्ति प्रदान कर सकता है। देवता, भौतिक जगत की दूसरी जीवित इकाइयों की तरह होते हैं, सभी का विनाश भौतिक संरचना के विनाश के समय होता है। वे स्वयं मुक्ति पाने में असमर्थ हैं और अपने भक्तों को मुक्ति देने की तो बात ही क्या है। देवता उपासकों को कुछ अस्थायी लाभ प्रदान कर सकते हैं, लेकिन अंतिम लाभ प्रदान नहीं कर सकते। केवल यही एक कारण है कि मुक्ति के प्रत्याशी जानबूझकर देवताओं की पूजा नहीं करते, हालाँकि उनमें से किसी के लिए भी उनका कोई अनादर नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥