श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.2.24 
पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमय: ।
तमसस्तु रजस्तस्मात्सत्त्वं यद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
अग्निकांड पृथ्वी को रूपांतरित कर देता है, लेकिन धुँआ कच्ची लकड़ी से बेहतर होता है। और आग उससे भी बेहतर होती है, क्योंकि आग से हमें उत्तम ज्ञान का लाभ मिलता है (वैदिक संस्कारों से)। इसी प्रकार, जुनून [रजस] अज्ञान [तमस] से बेहतर है, लेकिन अच्छाई [सत्व] सबसे अच्छी है क्योंकि भलाई के द्वारा व्यक्ति परम सत्य का एहसास कर सकता है।
 
Agnikashth is a transformation of clay, but smoke is better than wood. Fire is even better than that, because through fire (Vedic sacrifices) we can gain the benefits of superior knowledge. Similarly, Rajoguna is better than Tamoguna, but Sattvaguna is the best, because through Sattvaguna a man can realize the Absolute Truth.
तात्पर्य
जैसा कि ऊपर समझाया गया है, कोई भी भगवद व्यक्तित्व की भक्ति सेवा करके भौतिक अस्तित्व के सशर्त जीवन से मुक्त हो सकता है। यहाँ यह भी समझा जाता है कि भगवान की भक्ति सेवा के पात्र बनने के लिए व्यक्ति को अच्छाई के भाव (सत्व) के मंच तक उठना होगा। लेकिन अगर प्रगतिशील पथ पर बाधाएँ हैं, तो तमस के स्तर से भी कोई भी आध्यात्मिक गुरु के विशेषज्ञ मार्गदर्शन से धीरे-धीरे सत्व मंच तक पहुँच सकता है। इसलिए, ईमानदार उम्मीदवारों को ऐसी प्रगतिशील यात्रा के लिए एक विशेषज्ञ आध्यात्मिक गुरु से संपर्क करना चाहिए, और एक वास्तविक, विशेषज्ञ आध्यात्मिक गुरु जीवन के किसी भी चरण से एक शिष्य को निर्देशित करने में सक्षम होता है: तमस, रजस या सत्व।

इसलिए, यह सोचना गलत है कि ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के किसी भी गुण या किसी भी रूप की पूजा समान रूप से लाभकारी है। विष्णु को छोड़कर, सभी पृथक रूप भौतिक ऊर्जा की परिस्थितियों में प्रकट होते हैं, और इसलिए भौतिक ऊर्जा के रूप किसी को भी सत्व के मंच तक पहुँचने में मदद नहीं कर सकते, जो अकेले ही किसी व्यक्ति को भौतिक बंधन से मुक्त कर सकता है।

जीवन की असभ्य स्थिति, या निम्नतर जानवरों का जीवन, तमस भाव द्वारा नियंत्रित होता है। विभिन्न प्रकार के भौतिक लाभों के जुनून के साथ मनुष्य का सभ्य जीवन, रजस का चरण है। रजस जीवन स्तर दर्शन, कला और संस्कृति में नैतिक और नैतिक सिद्धांतों के साथ सूक्ष्म भावों के रूप में परम सत्य की प्राप्ति का एक हल्का सा सुराग देता है, लेकिन सत्व का भाव भौतिक गुण का एक और भी उच्च स्तर है, जो वास्तव में व्यक्ति को परम सत्य को महसूस करने में मदद करता है। दूसरे शब्दों में, विभिन्न प्रकार की पूजा विधियों के साथ-साथ ब्रह्मा, विष्णु और हर जैसे प्रमुख देवताओं से प्राप्त संबंधित परिणामों के बीच एक गुणात्मक अंतर होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)