श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.2.22 
अतो वै कवयो नित्यं भक्तिं परमया मुदा ।
वासुदेवे भगवति कुर्वन्त्यात्मप्रसादनीम् ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए निश्चय ही, अनादिकाल से ही सभी अध्यात्मवादी महापुरुष परमेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति अत्यंत हर्षपूर्वक करते आ रहे हैं, क्योंकि ऐसी भक्ति आत्मा को प्रसन्नता प्रदान करने वाली है।
 
Therefore certainly all spiritualists have been worshipping Lord Sri Krishna since eternity with great joy, because such devotion delights the soul.
तात्पर्य
भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति सेवा की विशिष्टता का यहाँ विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं-रूप परमात्मा हैं, और भगवत्ता के अन्य सभी रूप, श्री बलदेव, संकर्षण, वासुदेव, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न और नारायण से शुरू होकर पुरुष-अवतारों, गुण-अवतारों, लीला-अवतारों, युगावतारों और भगवत्ता की कई अन्य हजारों अभिव्यक्तियों तक का विस्तार करते हुए हैं, भगवान् श्रीकृष्ण के पूर्ण भाग और एकीकृत भाग हैं। जीव भगवत्ता के अलग-अलग हिस्से और पार्सल हैं। इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण भगवत्ता का मूल रूप हैं, और वे पारमार्थिकता में अंतिम शब्द हैं। इस प्रकार वह उच्चतर पारमार्थिकतावादियों के लिए अधिक आकर्षक हैं जो भगवान के शाश्वत लीलाओं में भाग लेते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण और बलदेव के अलावा भगवत्ता के अन्य रूपों में, वैसी अंतरंग व्यक्तिगत संपर्क की सुविधा नहीं है जैसी कि व्रजभूमि में भगवान के पारलौकिक लीलाओं में है। भगवान श्रीकृष्ण के पारलौकिक लीलाएँ नए नहीं हैं, जैसा कि कुछ कम बुद्धिमान व्यक्ति तर्क देते हैं; उनके लीलाएँ शाश्वत हैं और ब्रह्माजी के एक दिन में एक बार नियत रूप से प्रकट होते हैं, जैसे सूर्य हर चौबीस घंटे के अंत में पूर्वी क्षितिज पर उगता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)