श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.2.18 
नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया ।
भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
भागवत कक्षाओं में नियमित भागीदारी और पवित्र भक्त की सेवा करने से, हृदय के सभी कष्ट लगभग पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं और भगवान में प्रेममय सेवा, जिनकी स्तुति दिव्य गीतों से की जाती है, एक अटल तथ्य के रूप में स्थापित हो जाती है।
 
By regularly attending the classes of the Bhagavata and serving a pure devotee, all the sorrows of the heart are almost completely destroyed, and unshakable loving devotion is established for the holy Lord, Whose praise is sung in transcendental songs.
तात्पर्य
यहाँ हृदय से सभी अशुभ चीजों को दूर करने के उपाय के बारे में बताया गया है, जिन्हें आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में बाधाएँ माना जाता है। उपाय भागवतों का संग है। भागवत दो प्रकार के होते हैं, जैसे पुस्तक भागवत और भक्त भागवत। दोनों ही भागवत सक्षम उपाय हैं, और उनमें से दोनों या उनमें से कोई भी बाधाओं को दूर करने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं। एक भक्त भागवत उतना ही अच्छा है जितना कि पुस्तक भागवत क्योंकि भक्त भागवत अपना जीवन पुस्तक भागवत के संदर्भ में जीता है और पुस्तक भागवत ईश्वर के व्यक्तित्व और उनके शुद्ध भक्तों के बारे में जानकारी से भरा हुआ है, जो भागवत भी हैं। भागवत पुस्तक और व्यक्ति एक समान हैं।

भक्त भागवत भगवान के व्यक्तित्व, भगवान के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि होते हैं। इसलिए भक्त भागवत को प्रसन्न करके व्यक्ति को भागवत पुस्तक का लाभ प्राप्त हो सकता है। मानवीय तर्क यह समझने में विफल रहता है कि भक्त भागवत या पुस्तक भागवत की सेवा करने से मनुष्य को भक्ति के मार्ग पर क्रमिक उन्नति कैसे मिलती है। लेकिन वास्तव में ये वे तथ्य हैं जिन्हें श्रील नारददेव ने समझाया है, जो अपने पिछले जीवन में एक दासी का पुत्र था। दासी ऋषियों की तुच्छ सेवा में लगी हुई थी, और इस प्रकार वह भी उनके संपर्क में आया। और केवल उनके साथ जुड़कर और ऋषियों द्वारा छोड़े गए खाने के बचे हुए भोजन को स्वीकार करके, दासी के पुत्र को महान भक्त और व्यक्तित्व श्रील नारददेव बनने का मौका मिला। ये भागवतों के संबंध का चमत्कारी प्रभाव है। और इन प्रभावों को व्यवहार में समझने के लिए, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस तरह के भागवतों के निष्ठावान सहयोग से मनुष्य को निश्चित रूप से पारलौकिक ज्ञान बहुत आसानी से प्राप्त होता है, जिसके परिणामस्वरूप वह भगवान की भक्ति सेवा में नियत हो जाता है। जैसे-जैसे भागवतों के मार्गदर्शन में भक्ति सेवा में अधिक प्रगति होती है, वैसे-वैसे व्यक्ति भगवान की पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा में अधिक दृढ़ होता जाता है। अतः भागवत पुस्तक के संदेशों को भक्त भागवत से प्राप्त करना होगा और इन दोनों भागवतों का संयोजन नवोदित भक्त को निरंतर प्रगति करने में मदद करेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)