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श्लोक 1.2.17  |
शृण्वतां स्वकथा: कृष्ण: पुण्यश्रवणकीर्तन: ।
हृद्यन्त:स्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ॥ १७ ॥ |
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| अनुवाद |
| प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में परमात्मा के रूप में विराजमान और सच्चे भक्तों के हितैषी भगवान श्रीकृष्ण उस भक्त के हृदय से भौतिक सुख-सुविधाओं की इच्छा को दूर कर देते हैं जिसने उनकी कथाओं को सुनने में रुचि दिखाई है, क्योंकि ये कथाएँ ठीक ढंग से सुनने और कहने पर अत्यधिक पुण्यदायी होती हैं। |
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| प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में परमात्मा के रूप में विराजमान और सच्चे भक्तों के हितैषी भगवान श्रीकृष्ण उस भक्त के हृदय से भौतिक सुख-सुविधाओं की इच्छा को दूर कर देते हैं जिसने उनकी कथाओं को सुनने में रुचि दिखाई है, क्योंकि ये कथाएँ ठीक ढंग से सुनने और कहने पर अत्यधिक पुण्यदायी होती हैं। |
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