श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.2.12 
तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया ।
पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतगृहीतया ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
पूर्णतया जिज्ञासु विद्यार्थी या संत, जो ज्ञान और वैराग्य से सुसज्जित है, वह वेदांत-श्रुति से सुनी हुई भक्ति द्वारा परम सत्य का अनुभव करता है।
 
A serious seeker or sage, who is endowed with knowledge and detachment, realizes the Absolute Truth through devotion acquired by listening to the Vedanta-Shruti.
तात्पर्य
पूर्ण सत्य को तभी साकार किया जा सकता है, भगवान वासुदेव यांनी ईश्वर के व्यक्तित्व की भक्ति सेवा करते हुए जो पूर्ण सत्य हैं। ब्रह्म उनका दिव्य शारीरिक प्रकाश है और परमात्मा उनका आंशिक प्रतिनिधित्व है। इसलिए ब्रह्म या परमात्मा पूर्ण सत्य की प्राप्ति आंशिक प्राप्ति मात्र है। चार प्रकार के मनुष्य हैं-- कर्मी, ज्ञानी, योगी और भक्त। कर्मी भौतिकवादी हैं, जबकि अन्य तीन दिव्य हैं। प्रथम श्रेणी के दिव्य भक्त हैं जिन्होंने सर्वोच्च व्यक्तित्व को प्राप्त किया है। दूसरे श्रेणी के दिव्य वे हैं जिन्होंने पूर्ण व्यक्तित्व के पूर्ण भाग को आंशिक रूप से प्राप्त किया है। और तीसरे श्रेणी के दिव्य वे हैं जिन्होंने पूर्ण व्यक्तित्व के आध्यात्मिक फोकस को प्राप्त किया है। जैसे कि भगवद् गीता और अन्य वैदिक साहित्य में कहा गया है, सर्वोच्च व्यक्तित्व को भक्ति सेवा द्वारा प्राप्त किया जाता है, जो पूर्ण ज्ञान और भौतिक संगति से वैराग्य द्वारा समर्थित है। हमने पहले ही इस बिंदु पर चर्चा की है कि भक्ति सेवा का अनुसरण ज्ञान और भौतिक संगति से वैराग्य करता है। जैसे कि ब्रह्म और प्रमात्मा की प्राप्ति पूर्ण सत्य की अपूर्ण प्राप्ति है, इसलिए ब्रह्म और परमात्मा को प्राप्त करने का मार्ग, यानी ज्ञान और योग के मार्ग, पूर्ण सत्य को प्राप्त करने के अपूर्ण मार्ग भी हैं। भक्ति सेवा, जो पूरी तरह से ज्ञान और भौतिक संगति से वैराग्य के साथ संयुक्त है और जो वेदांत श्रुति के श्रवण ग्रहण द्वारा निश्चित है, एकमात्र पूर्ण विधि है जिसके द्वारा गंभीर जिज्ञासु छात्र पूर्ण सत्य को प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए, भक्ति सेवा कम बुद्धिमान श्रेणी के दिव्य के लिए नहीं है। भक्तों के तीन वर्ग हैं, अर्थात प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी। तृतीय श्रेणी के भक्त, या नवोदित, जिनके पास कोई ज्ञान नहीं है और जो भौतिक संगति से वैराग्य नहीं रखते हैं, लेकिन जो मंदिर में देवता की पूजा की प्रारंभिक प्रक्रिया से आकर्षित होते हैं, उन्हें भौतिक भक्त कहा जाता है। भौतिक भक्त आध्यात्मिक लाभ की तुलना में भौतिक लाभ से अधिक जुड़े होते हैं। इसलिए, व्यक्ति को भौतिक भक्ति सेवा की स्थिति से दूसरी श्रेणी की भक्ति स्थिति की ओर निश्चित प्रगति करनी होती है। दूसरे श्रेणी की स्थिति में, भक्त भक्ति रेखा में चार सिद्धांतों को देख सकते हैं, अर्थात् ईश्वर का व्यक्तित्व, उनके भक्त, अज्ञानी और ईर्ष्यालु। व्यक्ति को कम से कम दूसरे श्रेणी के भक्त की स्थिति तक ऊपर उठना होता है और इस प्रकार पूर्ण सत्य को जानने के योग्य बनना होता है।

इसलिए, एक तृतीय श्रेणी के भक्त को भागवत के आधिकारिक स्रोतों से भक्ति सेवा का निर्देश प्राप्त करना होता है। नंबर एक भागवत भक्त का स्थापित व्यक्तित्व है, और दूसरा भागवत ईश्वर का संदेश है। इसलिए तीसरे श्रेणी के भक्त को भक्ति सेवा के निर्देश को सीखने के लिए भक्त के व्यक्तित्व के पास जाना होता है। भक्त का ऐसा व्यक्तित्व एक पेशेवर व्यक्ति नहीं है जो भागवत के व्यवसाय से अपनी आजीविका कमाता है। ऐसा भक्त शुकदेव गोस्वामी का प्रतिनिधि होना चाहिए, जैसे सूत गोस्वामी, और सभी लोगों के चतुर्दिक लाभ के लिए भक्ति सेवा के पंथ का प्रचार करना चाहिए। एक नवोदित भक्त को अधिकारियों से सुनने में बहुत कम रुचि होती है। ऐसा नवोदित भक्त अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने के लिए पेशेवर व्यक्ति से सुनने का दिखावा करता है। इस प्रकार के सुनने और जप ने पूरी चीज को खराब कर दिया है, इसलिए व्यक्ति को दोषपूर्ण प्रक्रिया के बारे में बहुत सावधान रहना चाहिए। ईश्वर के पवित्र संदेश, जैसा कि भगवद गीता या श्रीमद भागवत में दिए गए हैं, निःसंदेह दिव्य विषय हैं, लेकिन इसके बावजूद, इस तरह के दिव्य विषयों को पेशेवर व्यक्ति से नहीं प्राप्त करना चाहिए, जो केवल अपनी जीभ के स्पर्श से दूध को खराब करने वाले सांप की तरह उन्हें खराब कर देता है।

एक सच्चे भक्त को इसलिए उपनिषद, वेदान्त, और अन्य लेखकों या गोस्वामीयों द्वारा हमारे लाभ के लिए छोड़ी हुई वैदिक साहित्य को सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए, जो हमारे प्रगति के लिए है। ऐसे साहित्य को सुने बिना, कोई भी वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता। और बिना सुने और निर्देशों का पालन किए, भक्ति सेवा का दिखावा बेकार हो जाता है और इसलिए भक्ति सेवा के मार्ग में एक प्रकार की बाधा बन जाता है। इस लिए, जब तक कि भक्ति सेवा श्रुति, स्मृति, पुराण या पंचरात्र अधिकारियों के सिद्धांतों पर स्थापित न हो जाए, तब तक भक्ति सेवा के दिखावे को तुरंत खारिज कर दिया जाना चाहिए। एक अनधिकृत भक्त को कभी भी शुद्ध भक्त के रूप में मान्यता नहीं मिलनी चाहिए। वैदिक साहित्यों के ऐसे संदेशों को आत्मसात करके, व्यक्ति भगवान के व्यक्तित्व के सर्वव्यापी स्थानीयकृत पहलू को अपने भीतर लगातार देख सकता है। इसे समाधि कहते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)