इसलिए, एक तृतीय श्रेणी के भक्त को भागवत के आधिकारिक स्रोतों से भक्ति सेवा का निर्देश प्राप्त करना होता है। नंबर एक भागवत भक्त का स्थापित व्यक्तित्व है, और दूसरा भागवत ईश्वर का संदेश है। इसलिए तीसरे श्रेणी के भक्त को भक्ति सेवा के निर्देश को सीखने के लिए भक्त के व्यक्तित्व के पास जाना होता है। भक्त का ऐसा व्यक्तित्व एक पेशेवर व्यक्ति नहीं है जो भागवत के व्यवसाय से अपनी आजीविका कमाता है। ऐसा भक्त शुकदेव गोस्वामी का प्रतिनिधि होना चाहिए, जैसे सूत गोस्वामी, और सभी लोगों के चतुर्दिक लाभ के लिए भक्ति सेवा के पंथ का प्रचार करना चाहिए। एक नवोदित भक्त को अधिकारियों से सुनने में बहुत कम रुचि होती है। ऐसा नवोदित भक्त अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने के लिए पेशेवर व्यक्ति से सुनने का दिखावा करता है। इस प्रकार के सुनने और जप ने पूरी चीज को खराब कर दिया है, इसलिए व्यक्ति को दोषपूर्ण प्रक्रिया के बारे में बहुत सावधान रहना चाहिए। ईश्वर के पवित्र संदेश, जैसा कि भगवद गीता या श्रीमद भागवत में दिए गए हैं, निःसंदेह दिव्य विषय हैं, लेकिन इसके बावजूद, इस तरह के दिव्य विषयों को पेशेवर व्यक्ति से नहीं प्राप्त करना चाहिए, जो केवल अपनी जीभ के स्पर्श से दूध को खराब करने वाले सांप की तरह उन्हें खराब कर देता है।
एक सच्चे भक्त को इसलिए उपनिषद, वेदान्त, और अन्य लेखकों या गोस्वामीयों द्वारा हमारे लाभ के लिए छोड़ी हुई वैदिक साहित्य को सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए, जो हमारे प्रगति के लिए है। ऐसे साहित्य को सुने बिना, कोई भी वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता। और बिना सुने और निर्देशों का पालन किए, भक्ति सेवा का दिखावा बेकार हो जाता है और इसलिए भक्ति सेवा के मार्ग में एक प्रकार की बाधा बन जाता है। इस लिए, जब तक कि भक्ति सेवा श्रुति, स्मृति, पुराण या पंचरात्र अधिकारियों के सिद्धांतों पर स्थापित न हो जाए, तब तक भक्ति सेवा के दिखावे को तुरंत खारिज कर दिया जाना चाहिए। एक अनधिकृत भक्त को कभी भी शुद्ध भक्त के रूप में मान्यता नहीं मिलनी चाहिए। वैदिक साहित्यों के ऐसे संदेशों को आत्मसात करके, व्यक्ति भगवान के व्यक्तित्व के सर्वव्यापी स्थानीयकृत पहलू को अपने भीतर लगातार देख सकता है। इसे समाधि कहते हैं।
