जैसा कि भागवत के पहले अध्याय के पहले श्लोक में समझाया गया है, परम सत्य आत्मनिर्भर, संज्ञानात्मक और सापेक्षता के भ्रम से मुक्त है। सापेक्ष संसार में जानने वाला जाने से अलग होता है, पर परम सत्य में जानने वाला और जानने की वस्तु दोनों एक ही चीज हैं। सापेक्ष संसार में जानने वाला जीवित आत्मा या श्रेष्ठ ऊर्जा होता है, जबकि ज्ञात निष्क्रिय पदार्थ या निम्न ऊर्जा होती है। इसलिए, अवर और श्रेष्ठ ऊर्जा का द्वैत है, जबकि पूर्ण क्षेत्र में जानने वाला और ज्ञात दोनों एक ही श्रेष्ठ ऊर्जा के हैं। सर्वोच्च ऊर्जावान की तीन प्रकार की ऊर्जाएँ होती हैं। ऊर्जा और ऊर्जावान में कोई अंतर नहीं है, लेकिन ऊर्जाओं की गुणवत्ता में अंतर होता है। परम क्षेत्र और जीवित संस्थाएँ एक ही श्रेष्ठ ऊर्जा के हैं, लेकिन भौतिक संसार निम्न ऊर्जा है। निम्न ऊर्जा के संपर्क में आने वाला जीव भ्रमित हो जाता है, यह सोचकर कि वह निम्न ऊर्जा से संबंधित है। इसलिए भौतिक संसार में सापेक्षता की भावना है। पूर्ण में जानने वाले और जाने के बीच ऐसा कोई अंतर नहीं है, और इसलिए वहाँ सबकुछ पूर्ण है।
