श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.2.10 
कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता ।
जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभि: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
जीवन की इच्छाओं को कभी भी इंद्रियों की संतुष्टि की ओर नहीं बढ़ाना चाहिए। मनुष्य को स्वस्थ जीवन या आत्म-संरक्षण की इच्छा ही रखनी चाहिए, क्योंकि मनुष्य परम सत्य के विषय में समझने के लिए बना है। मनुष्य के कार्यों का कोई अन्य लक्ष्य नहीं होना चाहिए।
 
जीवन की इच्छाओं को कभी भी इंद्रियों की संतुष्टि की ओर नहीं बढ़ाना चाहिए। मनुष्य को स्वस्थ जीवन या आत्म-संरक्षण की इच्छा ही रखनी चाहिए, क्योंकि मनुष्य परम सत्य के विषय में समझने के लिए बना है। मनुष्य के कार्यों का कोई अन्य लक्ष्य नहीं होना चाहिए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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