तत्रोपजग्मुर्भुवनं पुनाना
महानुभावा मुनय: सशिष्या: ।
प्रायेण तीर्थाभिगमापदेशै:
स्वयं हि तीर्थानि पुनन्ति सन्त: ॥ ८ ॥
अनुवाद
उस समय सभी महान विचारक, अपने शिष्यों के साथ-साथ, और जो साधु अपनी उपस्थिति से ही तीर्थ स्थलों को पवित्र कर सकते थे, वे सभी तीर्थयात्रा करने के बहाने वहाँ पहुँच गए।
On that occasion, great intellectuals and sages, accompanied by their disciples and those who definitely sanctified the holy places by their presence, reached there on the pretext of pilgrimage.
तात्पर्य
जब महाराज परीक्षित गंगा के तट पर बैठे, तो यह समाचार ब्रह्माण्ड की सभी दिशाओं में फैल गया, और महान विचारों वाले सभी ऋषि, जो इस अवसर के महत्व को समझ सकते थे, तीर्थयात्रा के बहाने वहाँ आये। असल में वे महाराज परीक्षित से मिलने आये थे, न कि तीर्थयात्रा के लिए स्नान करने, क्योंकि उन सभी में इतनी क्षमता थी कि वे तीर्थ स्थानों को पवित्र कर सकते थे। आम लोग अपने सभी पापों से खुद को शुद्ध करने के लिए तीर्थ स्थलों पर जाते हैं। इस तरह तीर्थ स्थान दूसरों के पापों से बोझिल हो जाते हैं। लेकिन जब ऐसे ऋषि तीर्थ स्थलों पर जाते हैं तो अपनी उपस्थिति से उन जगहों को पवित्र करते हैं। इसलिए महाराज परीक्षित से मिलने आए ऋषि आम लोगों की तरह खुद को शुद्ध करने में बहुत रुचि नहीं रखते थे, लेकिन उस स्थान पर स्नान करने के बहाने वे महाराज परीक्षित से मिलने आए क्योंकि वे भविष्यवाणी कर सकते थे कि श्रीमद-भागवतम का सुनाया जाएगा शुकादेव गोस्वामी द्वारा। वे सभी इस महाअवसर का लाभ उठाना चाहते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥