श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.19.37 
अत: पृच्छामि संसिद्धिं योगिनां परमं गुरुम् ।
पुरुषस्येह यत्कार्यं म्रियमाणस्य सर्वथा ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
आप महान संतों और भक्तों के गुरु हैं। इसलिए मैं आपसे अनुनय करता हूँ कि आप सभी मनुष्यों के लिए और विशेष रूप से मृत्यु की मुँह में जानेवाले के लिए सिद्धि का रास्ता बताएँ।
 
You are the Guru of great saints and devotees. Therefore I request you to show the path of perfection to all people and especially to those who are dying.
तात्पर्य
जब तक कोई पूर्णतः उत्सुक न हो अपने उत्कृष्ट होने के रास्ते के बारे में पूछताछ करने के लिए, कोई ज़रूरत नहीं है कि वह एक आध्यात्मिक गुरु के पास जाए। एक आध्यात्मिक गुरु एक गृहस्थ के लिए कोई साज-सज्जा नहीं है। आमतौर पर एक फैशनेबल भौतिकवादी एक तथाकथित आध्यात्मिक गुरु को रखता है बिना किसी लाभ के। वह छद्म आध्यात्मिक गुरु अपने तथाकथित शिष्य की चापलूसी करता है, और दोनों गुरु और शिष्य बिना किसी शक के नरक में चले जाते हैं। महाराज परीक्षित đúng प्रकार के शिष्य हैं क्योंकि वह बुनियादी प्रश्न पूछते हैं जो सभी मनुष्यों के हित के लिए ज़रूरी है, खासकर मरते हुए मनुष्यों के लिए। महाराज परीक्षित द्वारा पूछा गया प्रश्न श्रीमद-भागवतम के पूरे सिद्धांत का मूल सिद्धांत है। अब हम देखेंगे कि वह महान गुरु किस तरह होशियारी से जवाब देते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)