ततश्च व: पृच्छ्यमिमं विपृच्छे
विश्रभ्य विप्रा इति कृत्यतायाम् ।
सर्वात्मना म्रियमाणैश्च कृत्यं
शुद्धं च तत्रामृशताभियुक्ता: ॥ २४ ॥
अनुवाद
हे विश्वस्त ब्राह्मणों, मैं अपने वर्तमान कर्तव्य के विषय में पूछ रहा हूँ। विचार-विमर्श के बाद, मुझे बताइए कि सभी परिस्थितियों में सभी के कर्तव्य क्या है और विशेष रूप से मृत्यु के निकट पहुँचे हुए व्यक्ति का कर्तव्य क्या है।
O trustworthy brahmanas, I am now asking about my present duty. Please, after full deliberation, tell me about the duty of everyone in all circumstances, and especially about the duty of one who is about to die soon.
तात्पर्य
इस श्लोक में राजा ने ज्ञानी ऋषियों के सामने दो प्रश्न रखे हैं। पहला प्रश्न यह है कि सभी परिस्थितियों में सभी का कर्तव्य क्या है, और दूसरा प्रश्न यह है कि उसका विशेष कर्तव्य क्या है जिसे शीघ्र ही मरना है। दोनों में से, मरने वाले व्यक्ति से संबंधित प्रश्न सबसे अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति मरणशील है, या तो बहुत जल्द या सौ साल बाद। जीवन की अवधि अप्रासंगिक है, लेकिन मरने वाले व्यक्ति का कर्तव्य बहुत महत्वपूर्ण है। महाराजा परीक्षित ने ये दो प्रश्न शुकदेव गोस्वामी के सामने भी उनके आगमन पर रखे, और व्यावहारिक रूप से श्रीमद्-भागवतम का पूरा भाग, दूसरे स्कंध से शुरू होकर अंतिम, बारहवें स्कंध तक, इन दो प्रश्नों से संबंधित है। इसका निष्कर्ष यह है कि भगवान श्री कृष्ण की भक्ति सेवा, जैसा कि भगवद्-गीता के अंतिम चरणों में स्वयं भगवान ने पुष्टि की है, जीवन में सभी के स्थायी कर्तव्य के संबंध में अंतिम शब्द है। महाराजा परीक्षित पहले से ही इस तथ्य से अवगत थे, लेकिन वह चाहते थे कि वहां एकत्रित महान ऋषि अपने फैसले पर सर्वसम्मति से अपना फैसला दें ताकि वह बिना किसी विवाद के अपने पुष्ट कर्तव्य पर चल सकें। उन्होंने विशेष रूप से शुद्ध शब्द का उल्लेख किया है, या पूरी तरह से सही है। पारलौकिक बोध या आत्म-साक्षात्कार के लिए, विभिन्न प्रकार के दार्शनिकों द्वारा कई प्रक्रियाओं की सिफारिश की जाती है। उनमें से कुछ प्रथम श्रेणी के तरीके हैं, और उनमें से कुछ द्वितीय- या तृतीय-श्रेणी के तरीके हैं। प्रथम श्रेणी की विधि की मांग है कि व्यक्ति अन्य सभी विधियों को त्याग दे और भगवान के चरण कमलों में आत्मसमर्पण करें और इस प्रकार सभी पापों और उनकी प्रतिक्रियाओं से बच जाएँ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥